Tue. Jun 15th, 2021

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*हिन्दी/hinglish*             *शरह सलामे रज़ा*

*मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम*
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*कंज़ुल ईमान* – बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते दुरूद भेजते हैं उस ग़ैब बताने वाले नबी पर,ऐ ईमान वालों उन पर दुरूद और खूब सलाम भेजो

📕 पारा 22,सूरह अहज़ाब,आयत 56

* अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इस आयत में हमें 2 बातों का हुक्म दिया 1 अपने नबी पर दरूद पढ़ने का और दूसरा सलाम पढ़ने का,सलाम तो आप पर अत्तहयात में पढ़ा जाता है और दुरूद की इजाज़त हमें दुरूदे इब्राहीमी के ज़रिये मिली,सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये अल्फाज़ वो हैं कि इनका वजूद आपकी ज़ाते अक़दस से मन्क़ूल नहीं मगर 1400 साल से इज्माअ का इसमें इत्तिफाक़ है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नामे अक़दस सुनकर यही पढ़ा जाता है,इसी शरई इजाज़त की बिना पर हज़ारों लाखों दुरूदो सलाम के गुन्चे हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में उनके ग़ुलामों ने पेश किये,उन्हीं में से 2 कलाम सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला और मशहूर कलाम है एक अरबी ज़बान का मौला या सल्ली वसल्लिम दाईमन अबादन जिसे लिखा हज़रत शैख शर्फुद्दीन अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन सईद जिन्हें इमाम बूसीरी अलैहिर्रहमा के नाम से जाना जाता है और दूसरा कलाम उर्दू ज़बान का मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम जिसे लिखा इमाम अहले सुन्नत आलाहज़रत अज़ीमुल बरकत रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने

चुंकि आलाहज़रत का ये सलाम कई बार पब्लिश हुआ तो इसमें अशआर की तादाद में कई इख्तिलाफ हैं जैसे जनाब शम्श बरेलवी के नज़दीक 170 अशआर हैं,वहीं मुफ़्ती मुहम्मद खान क़ादरी साहब की तहक़ीक़ के मुताबिक 167 अशआर हैं,मशहूर शायर मौलाना अख्तर हामिदी साहब 172 अशआर फरमाते हैं और आपने तज़मीन भी 172 पर ही लिखी है मगर इसमें एक शेअर 2 बार आया है अगर उसको हटा दिया जाए तब इसकी तादाद 171 हो जाती है,रज़ा अकाडमी ने 25 सफर 1997 को जो हदायके बख्शिश शाया करवाई उसमें भी 171 अशआर ही लिखे हुए हैं और यही किताब मेरे पास भी मौजूद है,अब 171 अशआर में क्या क्या हुस्ने खूबियां हैं और किसके किसके बारे में बयान हुआ चलिये इसपर भी एक नज़र डालते हैं

1 से 30 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के खसाईसो कमालात व मोजज़ात पर मब्नी है

31 से 81 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सरापा यानि आपके हर उज़ू और उसकी खुसुसियात का तज़किरा है

82 से 90 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादत,बचपन,रज़ाअत,रज़ाई वालिदा,रज़ाई भाई बहनों के साथ ताल्लुक़ात पर है

91 से 99 तक का हिस्सा खिलवत व ज़िक्रो फ़िक्र,बोअसते मुबारक,शाने सुतूत व ग़लबए दीन पर मुश्तमिल है

100 से 104 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के गज़वात में हाज़िरी और आपकी बहादुरी पर मुश्तमिल है

105 से 117 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के खानदाने नब्वी और गुलशने ज़हरा की खुशबु से महक रहा है

118 से 126 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तमाम अज़वाज का ज़िक्र है

127 से 143 तक में हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तमाम सहाबा खुल्फ़ए राशिदीन और अशरये मुबश्शिरा का ज़िक्र है

144 से 149 तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ताबईन तबअ ताबईन और आले रसूल पर मब्नी है

150 और 151 में चारों इमामों का तज़किरा है

152 से 155 तक में ग़ौसे आज़म का तज़किरा है

156 से 161 तक में आलाहज़रत के सिलसिलए मशायख का तज़किरा है

162 से 165 तक में तमाम उम्मते मुस्लिमा आपके वालिदैन और उस्ताज़ और दोस्त अहबाब का बयान है

167 से इख़्तिताम पर आप दुआ फरमाते हैं कि कल क़यामत में मुझे यही सलाम पढ़ने की इजाज़त नसीब हो (इसके लिए अलग से पोस्ट “काश महशर में जब उनकी आमद हो और” नाम से बनी हुई है)

*ⓩ तो चलिये शुरू करते हैं एक नया सफर,मगर ये सफर है बहुत लम्बा क्योंकि जो किताब शरह सलामे रज़ा मेरे पास है वो 600 पेज की है अगर उसपर पोस्ट बनाऊं तो शायद 60-70 पोस्ट या हो सकता है कि और बन जाये,चलिये फिलहाल अभी तो शुरू करता हूं बाकी आगे देखा जायेगा,तो इस मुबारक सलाम के पहले शेअर का ये पहला मिसरह है,क्या है*

*मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम*

इसमें 3 जुज़ हैं 1. मुस्तफा 2. जाने रहमत 3. लाखों सलाम,चुंकि ये पहला मिसरह है इसलिए लाखों सलाम को भी साथ ले लेते हैं

*मुस्तफा* – ये हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का सिफ़ाती नाम है जिसके मायने होता है चुना हुआ,बुज़ुर्गदीदा,मक़बूल

*ⓩ मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ाते बा बरकात जिस तरह से भी देखी जाए वो बुज़ुर्गदीदा व अफ्ज़लो आला ही दिखाई देगी,खुद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो अल्लाह के मुंतखिब किये हुए हैं ही मगर जो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से मुहब्बत व उल्फत रखेगा व उनकी इताअत करेगा अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उस बन्दे को भी मुंतखिब फरमा लेगा ऐसा मैं नहीं खुद रब्बे ज़ुल्जलाल क़ुर्आन में इरशाद फरमाता है*

*कंज़ुल ईमान* – ऐ महबूब तुम फरमा दो कि ऐ लोगों अगर तुम अल्लाह को दोस्त रखते हो तो मेरे फरमा बरदार हो जाओ अल्लाह तुम्हे दोस्त रखेगा

📕 पारा 3,सूरह आले इमरान,आयत 31

*फुक़्हा* – बहुत सारी हदीसों और रिवायतों से ये बात आफताब से ज़्यादा रौशन है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वजूदे कायनात हैं कि अगर आप पैदा न होते तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कुछ भी पैदा नहीं फरमाता,न सूरज होता न चाँद सितारे न ज़मीन होती न आसमान न हवा न बादल न पेड़ न पानी न ज़न्नत न दोज़ख न दुनिया और न कोई आलम,गर्ज़ कि हर चीज़ का वजूद आपके होने से ही हुआ है और वहाबियों के पेशवा अशरफ अली थानवी ने भी इसी रिवायात को अपनी किताब में लिखा है

📕 मौलूदे महमूद,सफह 111-126
📕 नशरुतत्तबीब,सफह 6

*फुक़्हा* – अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने बन्दों के दिलों की तरफ तवज्जोह फरमाई तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के क़ल्बे अनवर को सबसे अफज़ल पाया लिहाज़ा उनको अपने लिए मुंतखिब फरमाया

📕 मुहम्मदुर रसूल अल्लाह,सफह 115

*ज़ात हुई इंतिखाब वस्फ हुए लाजवाब*
*नाम हुआ मुस्तफ़ा तुमपे करोड़ों दुरूद*

*फुक़्हा* – जब आपका जिसमे अनवर बनाने की बात आई तो अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम को सफेद और रौशन मिटटी लाने का हुक्म फरमाया तो हज़रत जिब्रील रौज़-ए अनवर की ज़मीन से मिटटी लाये जिसे जन्नती पानियों से गूँधा गया यहां तक कि वो सफेद मोतियों की तरह हो गयी,फिर उसमें से नूर की शुआऐं निकलने लगी और फरिश्ते उसे अर्शो कुर्सी आसमानों ज़मीन की सैर कराते रहे यहां तक कि तमाम फरिश्तों ने आपके बारे में जान लिया

📕 अलवफाउल वफा,सफह 34

*फुक़्हा* – इमाम मुहम्मद बिन साईब कल्बी कहते हैं कि मैंने हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जद्द में 500 साला माओं पर तहक़ीक़ की पर मुझे कोई ऐसी खातून नहीं मिली जिसमे जाहिलियत का कोई ऐब रहा हो मसलन ज़िना वगैरह

📕 शिफा शरीफ,जिल्द 1,सफह 17

*फुक़्हा* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जिब्रील मेरी बारगाह में आये और अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैंने ज़मीन के हर हर गोशे को बारहा देखा है मगर कोई भी आप जैसा अफ्ज़लो आला नहीं पाया और न बनी हाशिम के जैसा आला खानदान ही किसी का पाया

📕 शिफा शरीफ,जिल्द 1,सफह 362

*ⓩ गोया कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इल्म से हिल्म से हुस्न से जमाल से जिस्म से रूह से ताक़त से क़ुदरत से अखलाक़ से खानदान से हर अंदाज़ से अफ्ज़लो आला हैं और मुस्तफा का इतलाक़ आपही की ज़ात के लिए सबसे ज़्यादा मुनासिब है क्योंकि आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के मुंतखिब हैं,और ये लफ्ज़े मुस्तफा की मुख़्तसर तारीफ हुई वरना मुकम्मल मअलूमात के लिए अलग से किताबें पढ़नी होगी चलिये आगे बढ़ते हैं*

*जान-ए रहमत* – इसके भी 2 टुकड़े हैं पहला जान और दूसरा रहमत पहले जान की तारीफ समझ लीजिये कि जान कहते किसको हैं,जान की तारीफ लोग़ात में रूह ज़िन्दगी हयात निहायत अज़ीज़ माशूक़ वगैरह लिखी हुई है,यानि जान मायने रूह तो है ही मगर उर्फ़े आम में इंसान जब किसी को बे इंतिहा मुहब्बत करता है और अपनी जान से बढ़कर चाहता है तो उसको जान कहकर मुखातिब करता है,कभी मियां अपनी बीवी को कभी बीवी अपने शौहर को कहीं बाप अपनी औलाद को जान कहती नज़र आती है इससे ये पता चलता है कि इनमें कितनी मुहब्बत है गोया वो एक दूसरे की ज़िन्दगी हैं,और हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो तमाम आलम की जान हैं कि

*वो जो न थे तो कुछ न था*
*वो जो न हों तो कुछ न हो*
*जान हैं वो जहान की*
*और जान है तो जहान है*

18000 आलम हैं और हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम आलम की जान,1000 मख्लूक़ है जिसमें से 600 खुश्की में और 400 पानी में आबाद है और हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम मख्लूक़ की जान,मतलब ये कि तमाम इंसान और तमाम इंसानों की जान,तमाम फरिश्ते और और फिर उन फरिश्तो तमाम की जान,तमाम जिन्नात और फिर उन तमाम जिन्नातों की जान,ये अर्शो कुर्सी और उसकी जान,ये लौहो क़लम और उसकी जान,ये जन्नत और दोज़ख और उसकी जान,ये पहाड़ ये दरिया ये समन्दर और उसकी जान,ये हवा ये फिज़ा ये बादल ये घटा और उसकी जान,ये तमाम ज़मीन और उसकी जान,तमाम आसमान और उसकी जान,ये चांद सूरज सितारे और उसकी जान,इसी तरह अल हासिल गौर कीजिये कि ज़मीन के करोड़ों जानवर और समंदर में रहने वाले करोड़ों जानवर और उनकी जान,अब गौर कीजिये कि सबकी अपनी अपनी ज़िन्दगी और सबकी अपनी अपनी जान मगर क़ुर्बान जाईये मेरे आलाहज़रत पर फरमाते हैं मुस्तफा जाने रहमत

*ⓩ रहमत,अब हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रहमत हैं तो किस किस के लिए रहमत हैं तो इसके जवाब में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन में इरशाद फरमाता है कि*

*कंज़ुल ईमान* – और हमने तुम्हें न भेजा मगर रहमत सारे जहान के लिए

📕 पारा 17,सूरह अम्बिया,आयत 107

*तफसीर* – यहां आलमीन से मुराद तमाम मखलूक़े खुदा मुराद है यानि जिस जिस शय का रब अल्लाह है हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उसके लिए रहमत हैं तो ये कहना कि आप सिर्फ इंसानो और जिन्नातों के लिए ही रहमत हैं हरगिज़ दुरुस्त नहीं

📕 रुहुल मआनी,जिल्द 17,सफह 197
📕 शरह शिफा,जिल्द 1,सफह 38
📕 जवाहिरूल बहार,जिल्द 1,सफह 285

*जिब्रील पर रहमत* – हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैं इब्लीस के अंजाम की वजह से खौफ में रहता था मगर जब से आप पर नाज़िल कर्दा कलाम में मेरे बारे में ये फरमाया गया है कि वो साहिबे क़ुव्वत अर्श के पास रहता है वो मुत्तबये और अमीन है तबसे मैं बे खौफ हो गया हूं

📕 शिफा,जिल्द 1,सफह 19

*अर्शे आज़म पर रहमत* – शबे मेअराज अर्शे आज़म ने हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का दामन पकड़ कर कहा कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैं अल्लाह की सबसे बड़ी खल्क़ हूं मगर जबसे मैं पैदा हुआ उसकी इज़्ज़तो जलाल से लरज़ रहा था फिर मुझपर ला इलाहा इल्लल्लाह लिखा गया तो मेरी हैरत व इज़्तिराब और बढ़ गई फिर जब मुहम्मदुर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम लिखा गया तो मेरी बेचैनी दूर हुई कि आपका नाम मेरे लिए सूकूनो इत्मिनान का सबब है और आपकी वजह से ही मेरे बारे में लोगों का अक़ीदा दुरुस्त हो गया कि पहले वो मुझे ज़ाते बारी का मुहीत समझते थे पर आपने तालीम दी कि अल्लाह के लिए कोई शय मुहीत नहीं

📕 मदारिजुन नुबूवत,जिल्द 1,सफह 17

*काफिरों पर रहमत* – मुसलमानों पर उनकी रहमत है ये तो सभी जानते मानते और समझते हैं मगर काफिरों पर कैसे उनकी रहमत है देखिये,पहले की उम्मतों पर उनके नबी की इताअत न करने पर फौरन अज़ाब आ जाता था और पूरी की पूरी बस्ती व इलाक़ा आन की आन में तबाहो बर्बाद हो जाता था,मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आमद के बाद से किसी पर भी अज़ाब मुसल्लत नहीं किया गया जैसा कि खुदाये तआला क़ुर्आन में इरशाद फरमाता है कि

*कंज़ुल ईमान* – और जब (काफिर) बोले कि ऐ अल्लाह अगर यही (क़ुर्आन) तेरी तरफ से हक़ है तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या कोई दर्दनाक अज़ाब हम पर ला *(तो मौला तआला इसके जवाब में इरशाद फरमाता है कि)* और अल्लाह का काम नहीं कि उन्हें अज़ाब करे जब तक कि ऐ महबूब तुम उनमे तशरीफ फरमा हो

📕 पारा 9,सूरह ऐराफ,आयत 32-33

*ⓩ चुंकि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम क़यामत तक अपनी उम्मत में मौजूद हैं लिहाज़ा आपके वुजूदे अक़दस की वजह से वैसा अज़ाब कभी इस उम्मत पर नहीं आ सकता जैसा कि पहले की उम्मतों पर आया करता था,मेरे आलाहज़रत इसी मक़ाम को याद करते हुए और मुसलमानों को मुबारक बाद देते हुए फरमाते हैं कि*

*अंता फ़ीहिम ने अदु को भी लिया दामन में*
*ऐशे जावेद मुबारक तुझे शैदाइये दोस्त*

*ⓩ यानि जब हुज़ूर काफिरों के लिए भी रहमत बनकर आ गए तो फिर उनके ग़ुलामों का क्या कहना और उन्हें क्यों उनकी रहमत का हिस्सा न मिलेगा,तो जब कायनात की हर शय के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रहमत हैं तो मानना पड़ेगा कि हर शय का वजूद आप ही के वजूद का मरहूने मिन्नत है जैसा कि मैं पीछे बयान कर आया और बहुत कुछ बयान करना बाक़ी है मगर बात बहुत लम्बी हो जायेगी क्योंकि अभी पहले शेअर के पहले मिसरे की भी शरह मुकम्मल नहीं हो पाई है और ये तीसरी पोस्ट है,तो आगे बढ़ते हैं मैं इस सलाम से जुड़ा हुआ एक वाक़िया बयान कर रहा था कि*

इश्क़े मिजाज़ी के एक शायर हैं दाग़ देहलवी एक दिन उनकी महफिल जमी हुई थी अचानक उनके सामने ये कलाम आ गया मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम,दाग़ देहलवी बहुत देर तक उसको हैरत से तकते रहे काफी देर के बाद मचल कर बोले कि भाई ये कलाम किसका है,इत्तेफाक़ से उसी महफिल में शहज़ादये आलाहज़रत हुज़ूर हुज्जतुल इस्लाम इमाम हामिद रज़ा खान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु भी मौजूद थे आपने फरमाया कि बरेली के एक मौलाना है उन्ही का ये कलाम है जो कि मेरे वालिदे गिरामी हैं,फिर आपने उनसे पूछा कि क्या इसमें कुछ कमी नज़र आई तो दाग़ देहलवी कहते हैं कि नहीं बल्कि मौलाना होकर ऐसा कलाम लिखते हैं तअज्जुब है,उनका कहने का मतलब ये था कि मौलाना होकर इश्क़ के रंग में इतनी बड़ी कह डाली मुस्तफा जाने रहमत यानि तमाम आलम की जान,क्योंकि इश्क़े मिजाजी के शायर ही अपने महबूब को अक्सर जान रूह ज़िन्दगी व चांद सूरज सितारे आसमान ज़मीन हरियाली वादियां समंदर हूर परी वगैरह चीज़ों से तश्बीह दिया करते हैं ये कौन आलिम पैदा हो गए भाई कि जिसने हुज़ूर की तश्बीह 1 नहीं 1000 नहीं 1 लाख 1 करोड़ 1 अरब 1 खरब नहीं बल्कि दुनियाये जहान यहां तक कि अल्लाह के सिवा उसकी पैदा की हुई तमाम चीज़ों से कर डाली और सिर्फ तश्बीह ही नहीं की बल्कि हुज़ूर को तमाम आलम की रूह क़रार दे दिया कि जिस तरह रूह के बग़ैर जिस्म बेजान और बेकार है उसी तरह हुज़ूर के बग़ैर तमाम आलम बेजान और बेकार है,मुस्तफा जाने रहमत

*वो जो न थे तो कुछ न था*
*वो जो न हों तो कुछ न हो*
*जान हैं वो जहान की*
*और जान है तो जहान है*

फिर दाग़ देहलवी हुज़ूर हुज्जतुल इस्लाम से कहते हैं कि अब जब आपके अब्बा हुज़ूर कोई कलाम लिखें तो मुझे ज़रूर दिखायें,और मेरे आलाहज़रत तो फिर आलाहज़रत ठहरे आपको ज़रूर ज़रूर इस बात का इल्म अल्लाह ने करा दिया होगा जब ही तो उसके बाद आपने एक कलाम लिखा

*उनकी महक ने दिल के गुन्चे खिला दिए हैं*
*जिस राह चल गए हैं कूचे बसा दिए हैं*

सरकारे आलाहज़रत ने कलाम तो पूरा लिखा मगर मक़्तअ यानि जिसमें शायर का तखल्लुस इस्तेमाल होता है वो छोड़ दिया,हुज़ूर हुज्जतुल इस्लाम उसी हालत में वो कलाम लेकर दाग़ देहलवी के पास पहुंचे और आपको दिखाया उन्होंने पूरा कलाम पढ़ा और बे इख़्तियार होकर कहते हैं कि इसका मक़्तअ मैं लिखे देता हूं और लिखते हैं

*मुल्के सुखन की शाही तुमको रज़ा मुसल्लम*
*जिस सिम्त आ गए हो सिक्के बिठा दिए हैं*

मुल्क मायने जहान दुनिया सुखन मायने शेरो शायरी की दुनिया शाही मायने बादशाहत मुसल्लम मायने उसके क़ाबिल होना और दूसरे मिसरे में तो दाग़ देहलवी ने सब कुछ कह डाला कि आलाहज़रत जिस मैदान में भी क़दम रखते वो पूरा मैदान आलाहज़रात का हो जाता

*वादी रज़ा की कोह हिमाला रज़ा का है*
*जिस सिम्त देखिये वो इलाका रज़ा का है*
*अगलों ने तो लिखा है बहुत इल्म पर मगर*
*जो कुछ है इस सदी में वो तन्हा रज़ा का है*

*लाखों सलाम* – एक लफ्ज़ में लाखों सलाम भेजना ये भी शाने आलाहज़रत है

*ⓩ इसपर अक्सर मोअतरिज़ ऐतराज़ करता है एक लफ्ज़ में लाखों सलाम कह दिया तो लाखों सलाम पहुंच जायेगा क्या,वैसे तो ऐतराज़ करने वाला हर बात में ही ऐतराज़ करता है क्योंकि उसका काम ही ऐतराज़ करना है और जब बात हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की होती है तब उसका ऐतराज़ कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाता है,ऐसे लोगों की मिसाल उल्मा उस मक्खी से देते हैं जो पूरा खूबसूरत जिस्म छोड़कर ज़ख्म पर ही बैठा करती है उसी तरह ये मोअतरिज़ भी सालिहीन की लाखों करोड़ो खूबियों को छोड़कर सिर्फ उन बातों पर जोर देते हैं जिनमें कहीं से उन्हें कोई नुक्स का पहलु मिल जाये,अब जब ऐसा कोई पहलू नहीं निकलता तो लगते हैं मनघडंत बातें बनाने और ऐसी ऐसी बेढंगी बात करते हैं कि जिसका न कोई सर होता है और न पैर कि आदमी सुने तो अपना सर धुनता रहे,जैसे कि बहुत पहले की बात है कि एक साहब ने मुझसे एक हदीस सुनाकर कहा कि हदीस युं थी कि सहाब-ए किराम में से कोई हज़रात हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं तो अंदर से हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कौन अब वो साहब यहीं रुक गए और कहने लगे कि देखिये आप लोग कहते हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ग़ैब है अगर उनको ग़ैब होता तो अंदर से ही न जान लेते कि दरवाज़े पर कौन है नहीं जानते थे जब ही तो पूछा कौन है,अस्तग़्फ़िरुल्लाह,अब बताईये कि ये भी कोई ग़ैब की नफ़ी की दलील हुई,इसी तरह और भी बे सर पैर की बातें इन खुराफातियों के दिमाग़ में हमेशा चलती रहती है और जहां कोई भोला भाला सुन्नी मिला रख दिया उसके सामने ऐसी ही कोई एक बात और वो बेचारा अगर इल्म होगा तो कुछ बोलेगा वरना या तो चला जायेगा या फिर उसका ईमान उसकी बात सुनकर कमज़ोर हो जायेगा,हां तो मैं कह रहा था कि जब उन्होंने मुझसे ये बात कही तो पहले तो मुझे उनके इल्म पर हंसी आई गुस्सा भी आया पर मैंने उनको जवाब देने के बजाये पहले एक हदीस सुनाई (ये हदीस मैंने अपनी ज़बानी सुनाई आप किताब के हवाले के साथ मुलाहज़ा फरमायें)*

*हदीस* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि अल्लाह के कुछ फरिश्ते हैं जिनके ज़िम्मे सिर्फ यही काम है कि वो पूरी दुनिया की सैर करते रहते हैं और जहां कोई ज़िक्रे खैर मिला वहां उतर कर पूरी महफ़िल को अपने परों के साये में ले लेते हैं और ज़मीन से लेकर आसमान तक वो पूरी जगह को भर देते हैं जब तक कि वो महफिल बर्खास्त न हो जाये,फिर जब वो लोग वहां से उठ जाते हैं तो ये फरिश्ते भी वहां से चल देते हैं और रब की बारगाह में पहुंचते हैं मौला पूछता है कि कहां से आ रहे हो हालांकि वो सब जानता है फिर भी पूछता है,तो फरिश्ते अर्ज़ करते हैं कि एक जगह कुछ लोग तेरा ज़िक्र कर रहे थे और तुझसे कुछ तलब कर रहे थे तो रब पूछता है कि क्या मांग रहे थे तो फरिश्ते कहते हैं कि वो जन्नत मांग रहे थे तो मौला फरमाता है कि क्या उन्होंने जन्नत देखी है तो फरिश्ते कहते हैं कि नहीं तो मौला फरमाता है कि अगर देख लेते तो,तो फरिश्ते कहते हैं कि फिर वो और ज़्यादा उसके तलबग़ार होते फिर मौला पूछता है कि और क्या कह रहे थे तो फरिश्ते कहते हैं कि जहन्नम से पनाह मांग रहे थे तो मौला फरमाता है कि क्या उन्होंने जहन्नम देखी है तो फरिश्ते कहते हैं कि नहीं तो मौला फरमाता है कि अगर देख लेते तो,तो फरिश्ते कहते हैं कि फिर वो और ज़्यादा उससे पनाह मांगते,फिर फरिश्ते कहते हैं कि वो तुझसे माफी मांग रहे थे तो मौला फरमाता है कि मैंने उन सबको बख्श दिया और जो वो चाह रहे थे दिया और जिससे पनाह मांग रहे थे उससे पनाह दी,तो फरिश्ते अर्ज़ करते हैं कि ऐ मौला उसमे एक शख्स बहुत खताकार है वो वहां से गुज़र रहा था तो उनके साथ बैठ गया तो मौला तआला फरमाता है कि मैंने उसको भी बख्श दिया कि नेकों के साथ बैठने वाला महरूम नहीं रहता

📕 मुस्लिम,जिल्द 3,सफह 488

*ⓩ अब उनको हदीस सुनाने के बाद मैंने उनसे कहा कि अगर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इतना पूछ लेने से कि दरवाज़े पर कौन है तो वो ग़ैबदां नहीं रहे तब तो यही हुक्म आपको खुदा पर लगा देना चाहिए कि वो भी बा रहां फरिश्तों से पूछता है क्या कर रहे थे,कहां से आ रहे हो,वो क्या मांग रहे थे वगैरह वगैरह,कि आपके नज़दीक तो अब खुदा भी ग़ैबदां नहीं रहा मआज़ अल्लाह,तो इसका जवाब न तो उनके पास था जो वो मुझे देते और न दुनिया के किसी वहबी के पास है कि इसका जवाब दे सके,खैर आपको बताता हूं कि इसके 2 जवाब हैं पहला तो ये कि कुछ बातें फितरी तौर पर कही जाती है जैसे कि कौन क्या कैसे कहां कब वगैरह वगैरह कि अगर चे आप कुछ बातें आप जानते भी हों तब भी उसूलन उसे पूछा ही जाता है,मसलन आपने किसी को बुलाया वो दरवाज़े पर आया दस्तक दी आपको यक़ीनी तौर पर पता है कि वही होगा पर भी पूछते हैं कि कौन,घर में आपको पता है कि क्या पक रहा है फिर भी पूछते हैं कि क्या पका है,दोस्त के साथ कहीं जाने को निकले पता है कि कहां जाना है फिर भी पूछते हैं,तो पूछना एक फितरी बात है,और दूसरा जवाब ये है कि अगर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सवाल न करते या जानने के बावजूद भी बअज़ मर्तबा सहाबा से दरयाफ्त न करते तो फिर ये रिवायतें कैसे बनती और कैसे हम तक पहुंचती,कि आदमी के दिल में तो बहुत कुछ रहता है मगर दूसरों को पता तब ही चलता है जब वो कुछ बोलता है,अब इसी हदीस को ले लीजिए कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त सब कुछ जानता है उसे किसी से कुछ भी दरयाफ़्त करने की ज़रूरत नहीं है मगर जानने के बावजूद भी फरिश्तो से पूछा,अगर वो न पूछता और ये सवाल जवाब न होता तो ये रिवायत न बनती और हमें महफिले ज़िक्र के बारे में कभी पता न चलता कि उसकी क्या फज़ीलत है,अल्हम्दु लिल्लाह ऐतराज़ दफा हो गया अब जानिए कि क्या लाखों सलाम कह देने से क्या लाखों सलाम पहुंचेगा भी या नहीं,तो इसका जवाब है कि यक़ीनन लाखों सलाम पहुंचेगा ज़ैल में कुछ हवाले दर्ज करता हूं मुलाहज़ा फरमायें*

*सूरह इखलास* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जिसने 3 मर्तबा सूरह इखलास पढ़ी उसने पूरा क़ुर्आन पढ़ा

📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 327

*दुरूदे सआदत* – जो कोई ये दुरूद एक बार पढ़ेगा उसे 6 लाख दुरूद पढ़ने का सवाब मिलेगा

📕 दलाईलुल खैरात,सफह 101

*ⓩ अगर पेश करना चाहूं तो ऐसी ऐसी फज़ीलतो पर कई पोस्ट बन सकता हूं मगर समझाने के लिए इतना ही काफी है कि रब की बारगाह में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है जब वो एक बार क़ुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ने पर 10 पारों का सवाब अता करता है जब 1 बार दुरूद पढ़ने पर 6 लाख दुरूद का सवाब अत करता है तो उसी तरह एक बार ये कहने पर कि मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम तो वो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में लाखों सलाम पहुंचा भी देगा और हमें लाखों सलाम पढ़ने का सवाब भी अता कर देगा इन शाअ अल्लाह तआला*

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*END*
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*KANZUL IMAAN* – Beshak ALLAH aur uske farishte durood bhejte hain us gaib batane waale nabi par,ai imaan waalon un par durood aur khoob salaam bhejo

📕 Paara 22,surah ahzaab,aayat 56

* ALLAH Rabbul izzat ne is aayat me hamein 2 baato ka hukm diya 1 apne nabi par durood padhne ka aur doosra salaam padhne ka,salaam to aap par ATTAHYAAT me padha jaata hi hai aur durood ki ijazat hamein duroode ibraheemi ke zariye mili,SALLALLAHU TAALA ALAIHI WASALLAM ye alfaaz wo hain ki inka wajood aapki zaate aqdas se manqool nahin magar 1400 saal se ijmaa ka isme ittifaaq hai ki huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ka naame aqdas sunkar yahi padha jaata hai,isi sharayi ijazat ki bina par hazaron laakhon duroodo salaam ke gunche huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ki baargah me unke ghulamo ne pesh kiye,unhi me se 2 kalaam sabse zyada padha jaane waala aur mashhoor kalaam hai ek arbi ka MAULA YA SALLI WASALLIM DAAIMAN ABADAN jise likha hazrat shaikh sharfuddin abu abdullah muhammad bin saeed jinhein imaam BOOSEERI alaihirrahma ke naam se jaana jaata hai aur doosra kalaam urdu zabaan ka MUSTAFA JAANE RAHMAT PE LAAKHON SALAAM jise likha imaam ahle sunnat AALAHAZRAT azimul barkat raziyallahu taala nahu ne

Chunki AALAHAZRAT ka ye salaam kayi baar publish hua to isme ash’aar ki taadaad me kayi ikhtilaaf hain jaise janaab shamsh barailwi ke nazdeek 170 ashaar hain,wahin mufti muhammad khan qaadri sahab ki tahqeeq ke mutabik 167 ashaar hain,mashhoor shayar maulana akhtar haamidi sahab 172 ashaar farmate hain aur aapne tazmeen bhi 172 par hi likhi hai magar isme ek sher 2 baar aaya hai agar usko hata diya jaaye tab iski taadad 171 ho jaati hai,Raza Academy ne 25 safar 1997 ko jo hadayke bakhshish shaaya karwayi usme bhi 171 ashaar hi likhe hue hain aur yahi kitab mere paas bhi maujood hai,Ab 171 ashaar me kya kya husne khubiyan hain kiske kiske baare me bayaan hua chaliye ispar bhi ek nazar daalte hain

1 se 30 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke khasayiso kamalaat wa mojzaat par mabni hai

31 se 81 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke saraapa yaani aapke har uzu aur uski khususiyaat ka tazkira hai

82 se 90 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ki wiladat,bachpan,raza’at,razayi walida,razayi bhai bahano ke saath talluqat par hai

91 se 99 tak ka hissa khilwat wa zikro fikr,bosate mubarak,shaane sutoot wa galbaye deen par mushtamil hai

100 se 104 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke gazwaat me haaziri aur aapki bahaduri par mushtamil hai

105 se 117 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke khaandane nabwi aur gulshane zahra ki khushbu se mahak raha hai

118 se 126 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ki tamam azwaaj ka zikr hai

127 se 143 tak me huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke tamam sahaba khulfaye raashideen aur ashraye mubashshira ka zikr hai

144 se 149 tak huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke tabayeen taba tabayeen aur aale Rasool par mabni hai

150 aur 151 me charo imaamo ka tazkira hai

152 se 155 tak me GHAUSE AAZAM ka tazkita hai

156 se 161 tak me AALAHAZRAT ke silsilaye mashayakh ka tazkira hai

162 se 165 tak me tamam ummate musslima aapke walidain aur ustaaz aur dost ahbaab ka bayaan hai

167 se ikhtitaam par aap dua farmate hain ki kal qayamat me mujhe yahi salaam padhne ki ijazat naseeb ho (iske liye alag se post KAASH MAHSHAR ME JAB UNKI AAMAD HO AUR naam se bani huyi hai)

*ⓩ To chaliye shuru karte hain ek naya safar,magar ye safar hai bahut lamba kyunki jo kitab SHARAH SALAAME RAZA mere paas hai wo 600 page ki hai agar uspar post banaun to shayad 60-70 post ya ho sakta hai ki aur ban jaaye,chaliye filhaal abhi to shuru karta hoon baaki aage dekha jayega,to is mubarak salaam ke pahle sher ka ye pahla misra hai,kya hai*

*Mustafa Jaane Rahmat Pe Lakhoñ Salam*

Isme 3 juz hain 1. MUSTAFA 2. JAANE RAHMAT 3. LAAKHON SALAAM,chunki ye pahla misra hai isliye laakhon salaam ko bhi saath le lete hain

*MUSTAFA* – Ye huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ka sifaati naam hai jiska maayne hota hai chuna hua,buzurgdeeda, maqbool

*ⓩ Mustafa Jaane Rahmat sallallahu taala alaihi wasallam ki zaate ba barkaat jis tarah se bhi dekhi jaaye wo buzurgdeeda wa afzalo aala hi dikhayi degi,khud aap sallallahu taala alaihi wasallam to ALLAH ke muntakhib kiye hue hain hi magar jo huzoor sallallahu taala alaihi wasallam se muhabbat wa ulfat rakhega wa unki ita’at karega ALLAH rabbul izzat us bande ko bhi muntakhib farma lega aisa main nahin khud Rabbe zuljalaal quran me irshaad farmata hai*

*KANZUL IMAAN* – Ai mahboob tum farma do ki ai logon agar tum ALLAH ko dost rakhte ho to mere farma bardaar ho jao ALLAH tumhe dost rakhega

📕 Paara 3,surah aale imran,aayat 31

*FUQHA* – Bahut saari hadison aur riwayton se ye baat aaftab se zyada raushan hai ki huzoor sallallahu taala alaihi wasallam wajoode kaaynaat hain ki agar aap paida na hote to ALLAH Rabbul izzat kuchh bhi paida nahin farmata,na suraj hota na chand sitare na zameen hoti na aasmaan na hawa na baadal na peid na paani na jannat na dozakh na duniya aur na koi aalam,garz ki har cheez ka wajood aapke hone se hi hua hai aur wahabiyon ke peshwa ashraf ali thanvi ne bhi isi riwayat ko apni kitab me likha hai

📕 Mauloode Mahmood,safah 111-126
📕 Nashrut Tabeeb,safah 6

*FUQHA* – ALLAH Rabbul izzat ne bando ke dilo ki taraf tawajjoh farmayi to huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke qalbe anwar ko sabse afzal paaya lihaza unko apne liye muntakhib farmaya

📕 Muhammadur Rasool Allah,safah 115

*Zaat huyi intikhaab wasf hue lajawab*
*Naam hua mustafa tumpe croro durood*

*FUQHA* – Jab aapka jisme anwar banane ki baat aayi to ALLAH taala ne hazrat jibreel alaihissalam ko safed aur raushan mitti laane ka hukm farmaya to hazrat jibreel rauzaye anwar ki zameen se mitti laaye jise jannati paaniyon se goondha gaya yahan tak ki wo safed motiyon ki tarah ho gayi,phir usme se noor ki shuaien nikalne lagi aur farishte use arsho kursi aasmano zameen ki sair karate rahe yahan tak ki tamam farishton ne aapke baare me jaan liya

📕 Alwafaul wafa,safah 34

*FUQHA* – Imaam muhammad bin saayib kalbi kahte hain ki maine huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke jadd me 500 saala maaon par tahqeeq ki par mujhe koi aisi khatoon nahin mili jisme jaahiliyat ka koi aib raha ho maslan zina wagairah

📕 Shifa sharif,jild 1,safah 17

*FUQHA* – Huzoor sallallahu taala alaihi wasallam irshaad farmate hain ki jibreel meri baargah me aaye aur arz kiya ki ya Rasool ALLAH sallallahu taala alaihi wasallam maine zameen ke har har goshe ko ba raha dekha hai magar koi bhi aap jaisa afzalo aala nahin paaya aur na bani haashim ke jaisa aala khaandan hi kisi ka paaya

📕 Shifa sharif,jild 1,safah 362

*ⓩ Goya ki huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ilm se hilm se husn se jamaal se jism se rooh se taaqat se qudrat se akhlaaq se khaandan se har andaaz se afzalo aala hain aur MUSTAFA ka itlaaq aaphi ki zaat ke liye sabse zyada munasib hai kyunki aap sallallahu taala alaihi wasallam ALLAH Rabbul izzat ke muntakhib hain,Aur ye lafze MUSTAFA ki mukhtasar tareef huyi warna mukammal malumaat ke liye alag se kitabein padhni hogi chaliye aage badhte hain*

*JAAN-E RAHMAT* – Iske bhi 2 tukde hain pahla jaan aur doosra rahmat pahle jaan ki tareef samajh lijiye ki jaan kahte kisko hain,jaan ki tareef logaat me Rooh Zindagi Hayaat Nihayat azeez Mashooq wagairah likhi huyi hai,yaani jaan maayne rooh to hai hi magar urfe aam me insaan jab kisi ko be intiha muhabbat karta hai aur apni jaan se badhkar chahta hai to usko jaan kahkar mukhatib karta hai,miyan apni biwi ko kabhi biwi apne shauhar ko kahin baap apni aulaad ko jaan kahti nazar aati hai isse ye pata chalta hai ki inme kitni muhabbat hai goya wo ek doosre ki zindagi hain,Aur huzoor sallallahu taala alaihi wasallam to tamam aalam ki jaan hain ki

*Wo jo na the to kuchh na tha*
*Wo jo na hon to kuchh na ho*
*Jaan hain wo jahaan ki*
*Aur jaan hai to jahaan hai*

18000 aalam hai huzoor sallallahu taala alaihi wasallam tamam aalam ki jaan,1000 makhlooq jisme se 600 khushki me 400 paani me aabad hai aur huzoor sallallahu taala alaihi wasallam tamam makhlooq ki jaan,matlab ye ki tamam insaan aur tamam insaano ki jaan,tamam farishte aur aur phir un farishto tamam ki jaan,tamam jinnat aur phir un tamam jinnato ki jaan,ye arsho kursi aur uski jaan,ye lauho kalam aur uski jaan,ye jannat aur zozakh aur uski jaan,ye pahaad ye dariya ye samandar aur uski jaan,ye hawa ye fiza ye baadal ye ghata aur uski jaan,ye tamam zameen aur uski jaan,tamam aasman aur uski jaan,ye chaand suraj sitare aur uski jaan,isi tarah alhaasil gaur kijiye ki ALLAH ki kitni makhlooq hai zameen ke tamam jaanwar aur un tamam ki jaan,samandar me rahne waale croro jaanwar aur unki jaan,AB GAUR KIJIYE ki sabki apni apni zindagi aur sabki apni apni jaan magar qurbaan jayiye mere AALAHAZRAT par farmate hain MUSTAFA JAANE-E RAHMAT

*ⓩ RAHMAT,Ab huzoor sallallahu taala alaihi wasallam rahmat hain to kis kis ke liye rahmat hain ALLAH Rabbul izzat quran me irshaad farmata hai ki*

*KANZUL IMAAN* – Aur humne tumhe na bheja magar rahmat saare jahaan ke liye

📕 Paara 17,surah ambiya,aayat 107

*TAFSEER* – Yahan Aalameen se muraad tamam makhlooqe khuda muraad hai yaani jis jis shai ka Rub ALLAH hai huzoor huzoor sallallahu taala alaihi wasallam uske liye rahmat hain to ye kahna ki aap sirf insaano aur jinaato ke liye hi rahmat hain hargiz durust nahin

📕 Ruhul maa’ni,paara 17,safah 197
📕 Sharah shifa,jild 1,safah 38
📕 Jawahirul bahaar,jild 1,safah 285

*JIbreel par Rahmat* – Hazrat jibreel alaihissalam farmate hain ki ya Rasool ALLAH sallallahu taala alaihi wasallam main iblees ke anjaam ki wajah se khuaff me rahta tha magar jab se aap par naazil karda kalaam me mere baare me ye farmaya gaya hai ki wo saahibe quwwat arsh ke paas rahta hai wo muttabeu aur ameen hai tabse main be khauff ho gaya hoon

📕 Shifa,jild 1,safah 19

*Arshe aazam par Rahmat* – Shabe meraj arshe aazam ne huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ka daaman pakad kar kaha ki ya Rasool ALLAH sallallahu taala alaihi wasallam main ALLAH ki sabse badi khalq hoon magar jabse main paida hua uski izzato jalaal se laraz raha tha phir mujhpar LA ILAAHA ILLALLAH likha gaya to meri hairat wa iztiraab aur badh gayi phir jab MUHAMMADUR RASOOL ALLAH sallallahu taala alaihi wasallam likha gaya to meri be chaini door huyi ki aapka naam mere liye sukoono itminaan ka sabab hai aur aapki wajah se hi mere baare me logon ka aqeeda durust ho gaya ki pahle wo mujhe zaate baari ka muheet samajhte the par aapne taleem di ki ALLAH ke liye koi shai muheet nahin

📕 Madarijin nubuwat,jild 1,safah 17

*Kaafiron par Rahmat* – Musalmano par unki rahmat hai ye to sabhi jaante maante aur samajhte hain magar kaafiron par kaise unki rahmat hai dekhiye,pahle ki ummato par unke nabi ki ita’at na karne par fauran azaab aa jaata tha aur poori ki poori basti wa ilaaqa aan ki aan me tabaho barbaad ho jaata tha,magar huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ki aamad ke baad se kisi par bhi azaab musallat nahin kiya gaya jaisa ki khud quran me irshaad farmata hai ki

*KANZUL IMAAN* – Aur jab (kaafir) bole ki ai ALLAH agar yahi (quran) teri taraf se haq hai to hum par aasman se patthar barsa ya koi dardnaak azaab hum par la *(to maula taala iske jawab me irshaad farmata hai ki)* Aur ALLAH ka kaam nahin ki unhein azaab kare jab tak ki ai mahboob tum unme tashreef farma ho

📕 Paara 9,Surah eraaf,aayat 32-33

*ⓩ Chunki huzoor sallallahu taala alaihi wasallam qayamat tak apni ummat me maujood hain lihaza aapke wujoode aqdas ki wajah se waisa azaab kabhi is ummat par nahin aa sakta jaisa ki pahle ki ummato par aaya karta tha,mere AALAHAZRAT isi maqaam ko yaad karte hue aur musalmano ko mubarak baad dete hue farmate hain ki*

*Anta feehim ne adu ko bhi liya daaman me*
*Aise javed mubarak tujhe shaidaiye dost*

*ⓩ Yaani jab huzoor kaafiron ke liye bhi rahmat bankar aa gaye to phir unke ghulamo ka kya kahna aur unhe kyun unki rahmat ka hissa na milega,To jab kaaynaat ki har shai ke liye huzoor sallallahu taala alaihi wasallam rahmat hain to maanna padega ki har shai ka wajood aap hi ke wajood ka marhoone minnat hai jaisa ki main peechhe bayaan kar aaya aur bahut kuchh bayaan karna baaqi hai magar baat bahut lambi ho jayegi kyunki abhi pahle sher ke pahla misre ki bhi sharah mukammal nahin ho paayi hai aur ye teesri post hai,to main is salaam se juda hua ek waqiya bayaan kar raha tha ki*

Ishqe mijaazi ke ek shayar hain Daag Dehalavi ek din unki mahphil jami huyi thi achanak unke saamne ye kalaam aa gaya MUSTAFA JAANE RAHMAT PE LAAKHON SALAAM,Daag dehlavi bahut deir tak usko hairat se takte rahe kaafi deir ke baad machal kar bole ki bhai ye kalaam kiska hai,ittefaq se usi mahphil me shahzadaye AALAHAZRAT huzoor hujjatul islam imaam Haamid Raza khan raziyallahu taala anhu bhi maujood the aapne farmaya ki baraili ke ek maulana hai unhi ka ye kalaam hai jo ki mere waalide giraami hain,phir aapne unse poochha ki kya aapko isme kuchh nazar aaya to daag dehlavi kahte hain ki maulana hokar aisa kalaam likhte hain taajjub hai,unka kahne ka matlab ye tha ki maulana hokar ishq ke rang me itni badi kah daali MUSTAFA JAANE RAHMAT yaani tamam aalam ki jaan,kyunki ishqe mijaazi ke shayar hi apne mahboob ko aksar jaan rooh zindagi iske alawa chaand suraj sitare aasmaan zameen hariyali waadiyan samandar hoor pari wagairah cheezon se tashbeeh diya karte hain ye kaun aalim paida ho gaye bhai ki jisne huzoor ki tashbeeh 1 nahin 1000 nahin 1 laakh 1 crore 1 arab 1 kharab nahin balki duniyaye jahaan yahan tak ki ALLAH ke siwa uski paida ki huyi tamam cheezon se kar daali aur sirf tashbeeh hi nahin ki balki huzoor ko tamam aalam ki rooh qaraar de diya ki jis tarah rooh ke bagair jism bejaan aur bekaar hai usi tarah huzoor ke bagair tamam aalam bejaan aur bekaar hai,MUSTAFA JAAN-E RAHMAT

*Wo jo na the to kuchh na tha*
*Wo jo na hon to kuchh na ho*
*Jaan hain wo jahaan ki*
*Aur jaan hai to jahaan hai*

Phir daag dehlavi huzoor hujjatul islam se kahte hain ki ab jab aapke abba huzoor koi kalaam likhen to mujhe zaroor dikhayein,aur mere AALAHAZRAT to phir AALAHAZRAT thahre aapko zaroor zaroor is baat ka ilm ALLAH ne kara diya hoga jab hi to uske baad aapne ek kalaam likha

*Unki mahak ne dil ke gunche khila diye hain*
*Jis raah chal gaye hain kooche basa diye hain*

Sarkare AALAHAZRAT ne kalaam to poora likha magar MAQT’A yaani jisme shayar ka takhallus istemal hota ahi wo chhod diya,huzoor hujjatul islaam usi haalat me wo kalaam lekar daag dehlavi ke paas pahunche aur aapko dikhaya unhone poora kalaam padha aur be ikhtiyar hokar kahte hain ki iska MAQT’A main likhe deta hoon aur likhte hain

*Mulke sukhan ki shaahi tumko RAZA musallam*
*Jis simt aa gaye ho sikke bitha diye hain*

MULK maayne jahaan duniya SUKHAN maayne shero shayri ki duniya SHAAHI maayne baadshahat MUSALLAM maayne uske qaabil hona,aur doosre misre me to daag dehlavi ne sab kuchh kah daala ki AALAHAZRAT jis maidaan me bhi qadam rakhte wo poora maidaan ALLAHAZRAT ka ho jaata

*Waadi Raza ki koh himala Raza ka hai*
*Jis simt dekhiye wo ilaaqa Raza ka hai*
*Aglo ne to likha hai bahut ilm par magar*
*Jo kuchh hai is sadi me wo tanha Raza ka hai*

*LAAKHON SALAAM* – Ek lafz me laakhon salaam bhejna ye bhi shaane AALAHAZRAT HAI

*ⓩ Ispar aksar motariz aitraz karta hai ek lafz me laakhon salaam kah diya to kya laakhon salaam pahunch jayega kya,waise to aitraz karne waala har baat me hi aitraz karta hai kyunki uska kaam hi aitraz karna hai aur jab baat huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ki hoti hai tab uska aitraz kuchh zyada hi badh jaata hai,aiso logon ki misaal ulma us makkhi se dete hain jo poora khoobsurat jism chhodkar zakhm par hi baitha karti hai usi tarah ye motariz bhi saaliheen ki lakhon croro khubiyon ko chhodkar sirf un baaton par zor dete hain jinme kahin se unhe koi nuks ka pahlu mil jaaye,ab jab aisa koi pahlu nahin nikalta to lagte hain man ghandant baatein banane aur aisi aisi be dhangi baat karte hain ki jiska na koi sar hota hai aur na koi pair ki aadmi sune to apna sar dhunta rahe,jaise ki bahut pahle ki baat hai ki ek sahab ne mujhse ek hadees sunakar kaha ki hadees yun thi ki sahabaye kiraam me se koi hazraat huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke darwaze par dastak dete hain to andar se huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ne farmaya KAUN ab wo sahab yahin ruk gaye aur kahne lage ki dekhiye aap log kahte hain ki huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ko gaib hai agar unko gaib hota to andar se hi na jaan lete ki darwaze par kaun hai nahin jaante the jab hi to poochha kaun hai,ASTAGFIRULLAH,ab bataiye ki ye bhi koi gaib ki nafi ki daleel huyi,isi tarah aur bhi be sar pair ki baatein in khurafatiyon ke dimaag me hamesha chalti rahti hai aur jahan koi bhola bhaala sunni mila rakh diya uske saamne aisi hi koi ek baat aur wo be chaara agar ilm hoga to kuchh bolega warna ya to chala jayega ya phir uska imaan uski baat sunkar kamzor ho jayega,haan to main kah raha tha ki jab unhone mujhse ye baat kahi to pahle to mujhe unke ilm par hansi aayi gusaa bhi aaya par maine unko jawab dene ke bajaye pahle ek hadees sunayi (ye hadees maine apni zabani sunayi aap kitab ke hawale ke saath mulahza farmayein)*

*HADEES* – Huzoor sallallahu taala alaihi wasallam irshaad farmate hain ki ALLAH ke kuchh farishte hain jinke zimme sirf yahi kaam hai ki wo poori duniya ki sair karte rahte hain aur jahan koi zikre khair mila wahan utar kar poori mahfil ko apne paro ke saaye me le lete hain aur zameen se lekar aasman tak wo pooro jagah ko bhar dete hain jab tak ki wo mahfil barkhaast na ho jaaye,phir jab wo log wahan se uth jaate hain to ye farishte bhi wahan se chal dete hain aur Rub ki baargah me pahunchte hain maula poochhta hai ki KAHAN SE AA RAHE HO halanki wo sab jaanta hai phir bhi poochhta hai,to farishte arz karte hain ki ek jagah kuchh log tera zikr kar rahe the aur tujhse kuchh talab kar rahe the to Rub poochhta hai ki KYA MAANG RAHE THE to farsihte kahte hain ki wo jannat maang rahe the to maula farmata hai ki kya unhone jannat dekhi hai to farishte kahte hain ki nahin to maula farmata hai ki agar dekh lete to,to farishte kahte hain ki phir wo aur zyada uske talabgaar hote phir maula poochhta hai ki AUR KYA KAH RAHE THE to farishte kahte hain ki jahannam se panaah maang rahe the to maula farmata hai ki kya unhone jahannam dekhi hai to farishte kahte hain ki nahin to maula farmata hai ki agar dekh lete to,to farishte kahte hain ki phir wo aur zyada usse panaah maangte,phir farishte kahte hain ki wo tujhse maafi maang rahe the to maula farmata hai ki maine un sabko bakhsh diya aur jo wo chah rahe the diya aur jisse panaah maang rahe the usse panaah di,to farishte arz kahte hain ki ai maula usme ek shakhs bahut khata kaar hai wo wahan se guzar raha tha to unke saath baith gaya to maual taala farmata hai ki maine usko bhi bakhsh diya ki neko ke saath baithne waala mahroom nahin rahta

Muslim,jild 3,safah 488

*ⓩ Ab unko hadees sunane ke baad maine unse kaha ki agar huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ke itna poochh lene se ki DARWAZE PAR KAUN HAI wo gaib daa nahin rahe tab to yahi hukm aapko khuda par laga dena chahiye ki wo bhi ba raha faristo se poochhta hai KYA KAR RAHE THE,KAHAN SE AA RAHE HO,WO KYA MAANG RAHE THE wagairah wagairah,ki aapke nazdeek to khuda bhi gaib daa nahin raha maaz ALLAH,to iska jawab na to unke paas tha jo wo mujhe dete aur na duniya ke kisi wahabi ke paas hai ki iska jawab de sake,khiar aapko batata hoon ki iske 2 jawab hain pahla to ye ki kuchh baatein fitri taur par kahi jaati hai jaise ki kaun kya kaise kahan kab wagairah wagairah ki agar che aap kuchh baatein aap jaante bhi hon tab bhi usulan use poochha hi jaata hai,maslan aapne kisi ko bulaya wo darwaze par aaya dastak di aapko yaqeeni taur par pata hai ki wahi hoga par bhi poochhte hain ki kaun ghar me aapko pata hai ki kya pak raha hai phir bhi poochhte hain ki kya paka hai,dost ke saath kahin jaane ko nikle pata hai ki kahan jaana hai phir bhi poochhte hain,to poochhna ek fitri baat hai,aur doosra jawab ye hai ki agar huzoor sallallahu taala alaihi wasallam sawal na karte ya jaanne ke ba wajood bhi baaz martaba sahaba se daryaaft na karte to phir ye riwaytein kaise banti aur kaise hum tak pahunchti,ki aadmi ke dil me to bahut kuchh rahta hai magar doosro ko pata tab hi chalta hai jab wo kuchh bolta hai,ab isi hadees ko le lijiye ki ALLAH Rabbul izzat sab kuchh jaanta hai use kisi se kuchh bhi daryaaft karne ki zarurat nahin hai magar jaanne ke ba waajood bhi farishto se poochha,agar wo na poochhta aur ye sawal jawab na hota to ye riwayat na banti aur hamein mahfile zikr ke baare me kabhi pata na chalta ki uski kya fazilat hai,ALHAMDU LILLAH aitraz dafa ho gaya ab jaaniye ki kya laakhon salaam kah dene se kya laakhon salaam pahunchega bhi ya nahin,to iska jawab hai ki yaqinan laakhon salaam pahunchega zail me kuchh hawale darj karta hoon mulahza farmayein*

*SURAH IKHLAAS* – Huzoor sallallahu taala alaihi wasallam irshaad farmate hain ki jisne 3 martaba surah ikhlaas padhi usne poora quran padha

Tirmizi,jild 2,safah 327

*DUROOD-E SA’AADAT* – Jo koi ye duroor ek baar padhega use 6 laakh durood padhne ka sawab milega

Dalailul khairat,safah 101

*ⓩ Agar pesh karna chahun to aisi aisi fazilato par kayi post ban sakta hoon magar samjahne ke liye itna hi kaafi hai ki Rub ki baargah me kisi cheez ki koi kami nahin hai jab wo ek baar QUL HUWALLAH SHARIF padhne par 10 paaro ka sawab ata kar sakta hai jab 1 baar durood padhne par 6 laakh durood ka sawab ata kar sakta hai to usi tarah ek baar ye kahne par ki MUSTAFA JAANE RAHMAT PE LAAKHON SALAAM to wo huzoor sallallahu taala alaihi wasallam ki baargah me laakhon salaam pahuncha bhi dega aur hamein laakhon salaam padhne ka sawab bhi ata kar dega in shaw ALLAH*

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*Don’t Call Only WhatsApp 9559893468*
*NAUSHAD AHMAD “ZEB” RAZVI*
*ALLAHABAD*
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By Zebnews

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