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*27/07/1442*

*हिन्दी/hinglish*               *मेअराज शरीफ*

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*तमाम सुन्नियों को शबे मेअराज बहुत बहुत मुबारक हो*

*फुक़्हा* – रायज यही है कि हुज़ूर ﷺ को मेअराज शरीफ रजब की 27वीं शब में हिजरत से पहले मक्का मुअज़्ज़मा में हज़रते उम्मे हानी के घर से हुई

📕 ज़रक़ानी,जिल्द 1,सफह 355

*फुक़्हा* – हुज़ूर ﷺ को 34 बार मेअराज हुई 33 बार रूहानी यानि ख्वाब में और 1 बार जिस्मानी यानि जागते हुए

📕 मदारेजुन नुबूवत,जिल्द 1,सफह 288

*ⓩ हुज़ूर ﷺ को रात ही रात एक आन में मस्जिदें हराम से मस्जिदे अक्सा ले जाया गया फिर वहां से सातों आसमानों की सैर कराई गयी फिर सिदरह से आगे 50000 हिजाबात तय कराये गए जन्नत व दोज़ख दिखाई गयी और सबसे बढ़कर खुदा का दीदार हुआ,मगर जैसा कि मुनकेरीन की आदत है हर बात का इंकार करने की तो इस पर भी ऐतराज़ किया जाता है कि हुज़ूर ﷺ को मेराज जिस्म के साथ हुई ही नहीं बल्कि ख्वाब में ऐसा हुआ,उनका कहना है कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई 27 साल का सफर एक पल में कर आये,तो इसका जवाब ये है कि अगर खुदा की कुदरत का इक़रार अक़्ल के हिसाब से ही किया जाए तब तो ये भी नहीं हो सकता,ग़ौर करें कि मस्जिदें हराम यानि काबा मुअज़्ज़मा से बैतुल मुक़द्दस का सफर करने में 1 महीने से ज़्यादा लग जाते थे जिसकी दूरी 666 मील है*

1 मील = 1.60934 किलोमीटर
666 मील = 1.60934 = 1071 किलोमीटर
फिर इतना जाना और वापस आना यानि
1071 + 1071 = 2142 किलोमीटर

*ⓩ अब ये बताइए कि 2142 किलोमीटर का सफर अगर हुज़ूर ﷺ तेज़ घोड़े से भी करते तो एक घोड़ा अगर बहुत ते़ज दौड़े तो उसकी स्पीड 70 किलोमीटर पर घंटे की होगी,इस हिसाब से*

2142 / 70 = 30.6

*ⓩ और अगर ऊंट से सफर करते तब,ऊंट की रफ़्तार तो घोड़े से कम ही होती है,मतलब ये कि 30 घंटे से भी ज़्यादा वक़्त लगता आपको आने और जाने में,तो अगर अक़्ल के हिसाब से ही मानना है तो मस्जिदें हराम से मस्जिदे अक़्सा के सफर का भी इनकार करो क्योंकि अगर एक ही रात में हुज़ूर ﷺ आसमानों की सैर नहीं कर सकते जन्नत दोजख नहीं देख सकते खुदा का दीदार नहीं कर सकते तो फिर एक ही रात में काबा से मस्जिदे अक्सा भी नहीं पहुंच सकते,अगर वो नामुमकिन है तो ये भी नामुमकिन है,मगर ऐसा तो कर ही नहीं पाओगे क्योंकि ये नामुमकिन काम उस रात मुमकिन हुआ है,अगर इंकार करोगे तो काफिर हो जाओगे रब तआला क़ुर्आन में इरशाद फरमाता है कि*

*कंज़ुल ईमान* – पाक है वो ज़ात जो ले गया अपने बन्दे को रात ही रात मस्जिदें हराम से मस्जिदे अक्सा

📕 पारा 15,सूरह असरा,आयत 1

*ⓩ अक़्ल से फैसला करने वालो तुम्हारी अक़्ल के परखच्चे उड़ जायेंगे,अगर एक महीने का सफर एक आन में हो सकता है बल्कि हुआ है क़ुर्आन शाहिद है तो फिर 27 साल का सफर भी एक आन में हो सकता है अगर ये मुमकिन है तो वो भी मुमकिन है,इसके अलावा तीन और दलील है कि हुज़ूर ﷺ को मेअराज हुई और जिस्म के साथ हुई*

*1* अल्लाह इस आयत में फरमाता है कि अपने बन्दे को ले गया,तो बन्दा किसको कहते हैं इस पर इमाम राज़ी अलैहिर्रहमा फरमाते हैं कि

*फुक़्हा* – अब्द का इतलाक़ रूह और जिस्म दोनों पर होता है

📕 मफातीहुल ग़ैब,जिल्द 20,सफह 295

*ⓩ और इसकी सराहत खुद क़ुर्आन मुक़द्दस में मौजूद है,मौला फरमाता है कि*

*कंज़ुल ईमान* – क्या तुमने नहीं देखा जिसने मेरे बन्दे को नमाज़ से रोका

📕 पारा 30,सूरह अलक़,आयत 9

*कंज़ुल ईमान* – और ये कि जब अल्लाह का बंदा उसकी बंदगी करने को खड़ा हुआ तो क़रीब था कि वो जिन्न उस पर ठठ्ठा की ठट्ठा हो जायें

📕 पारा 27,सूरह जिन्न,आयत 19

*ⓩ बताइये नमाज़ रूह पढ़ती है या जिस्म या कि दोनों,ज़ाहिर सी बात है की दोनों,तो मेराज में भी हुज़ूर ﷺ का जिस्म और रूह दोनों मौजूद थी*

*2* सारी दुनिया जानती है कि मेअराज में हुज़ूर ﷺ के लिए बुर्राक़ लाया गया,अगर मेअराज रूह की थी तो बुर्राक़ का क्या काम,क्या बुर्राक़ रूह को उठाने के लिए लाया गया था

*3* अगर हुज़ूर ﷺ को मेअराज ख्वाब में होती तो मुनकिर इन्कार क्यों करता,क्योंकि ख्वाब में आसमान की सैर करना कोई कमाल तो नहीं,मतलब ये कि मेअराज जिस्म के साथ ही हुई थी

📕 रुहुल बयान,पारा 15,सफह 8

*हुज़ूर ﷺ ने खुदा का दीदार किया*

*कंज़ुल ईमान* – आंख ना किसी तरफ फिरी और ना हद से बढ़ी

📕 पारा 27,सूरह नज्म,आयत 17

*ⓩ मतलब ये कि शबे मेअराज हुज़ूर ﷺ ने अपने रब को अपने सर की आंखों से देखा,उसी देखने को मौला तआला फरमाता है कि ना तो देखने में ही आंख फेरी और ना ही बेहोश हुए जैसा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम रब के जलवों की ताब ना ला सके और बेहोश हो गए,और इस देखने की तफसील खुद हुज़ूर ﷺ इस तरह इरशाद फरमाते हैं कि*

*हदीस* – इज़्ज़त वाला जब्बार यहां तक क़रीब हुआ कि 2 कमानों या उससे भी कम फासला रह गया

📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 1120

*फुक़्हा* – चारों खुल्फा यानि हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ हज़रत उमर फारूक़ हज़रत उस्मान गनी हज़रत मौला अली व अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास अब्दुल्लाह बिन हारिश अबि बिन कअब अबू ज़र गफ्फारी मआज़ बिन जबल अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद अबू हुरैरह अनस बिन मालिक और भी बहुत से सहाबा का यही मज़हब है कि हुज़ूर ﷺ ने अपने सर की आंखों से रब तआला को देखा

📕 शिफा शरीफ,जिल्द 1,सफह 119

*फुक़्हा* – हुज़ूर ﷺ के मेअराज जिस्मानी के ताल्लुक़ से बुखारी व मुस्लिम व अबु दाऊद व इब्ने माजा व शिफ़ा शरीफ वगैरह में इन जलीलुल क़द्र सहाबये किराम से हदीसे पाक मरवी है,जिनमे हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ हज़रत उमर फारूक़ हज़रत उस्मान गनी हज़रत मौला अली हज़रत अबी बिन कअब हज़रत ओसामा बिन ज़ैद हज़रत अनस बिन मालिक हज़रत बिलाल बिन हिमामा हज़रत बिलाल बिन सअद हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह हज़रत हुज़ैफा बिन इहान हज़रत समरह बिन जुन्दब हज़रत सहल बिन सअद हज़रत शद्दाद बिन रूसी हज़रत हबीब बिन सनान हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमरू हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर हज़रत अब्दुल्लाह बिन ऊफी हज़रत अब्दुल्लाह बिन सअद हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद हज़रत अब्दुर्रहमान बिन आबिस हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब हज़रत मालिक बिन समद हज़रत अबुल हमरा हज़रत अबु अय्यूब अंसारी हज़रत अबु हुरैरह हज़रत अबु दर्दा हज़रत अबुज़र गफ्फारी हज़रत अबु सईद खुदरी हज़रत अबु सुफियान हज़रत अस्मा बिन्त अबि बक्र हज़रत उम्मे हानी हज़रत उम्मे कुलसुम बिन्त हुज़ूर ﷺ उम्मुल मोमेनीन हज़रत आईशा सिद्दीक़ा उम्मुल मोमेनीन हज़रत उम्मे सलमा रिज़वानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन

📕 रुहुल बयान,पारा 27,सफह 168

*फुक़्हा* – इसके अलावा भी दीगर फुक़्हा व अइम्मा का यही मज़हब रहा कि हुज़ूर ﷺ ने खुदा का दीदार किया

📕 अलमुस्तदरक,जिल्द 1,सफह 65
📕 फत्हुल बारी,जिल्द 7,सफह 174
📕 खसाइसे कुबरा,जिल्द 1,सफह 161
📕 ज़रक़ानी,जिल्द 6,सफह 118

*ⓩ अब जो लोग ये ऐतराज़ करते हैं कि हुज़ूर ﷺ ने खुदा को नहीं देखा बल्कि जिब्रीले अमीन को देखा तो तो मैं उनसे कहना चाहूंगा कि क्या मेरे आक़ा जिब्रील को देखने के लिए सिदरह तशरीफ ले गए थे,अरे जो खुद 24000 मर्तबा मेरे आक़ा की बारगाह में आये हों उन्हें देखना हुज़ूर ﷺ के लिए कोई कमाल नहीं,बल्कि वो तो हुज़ूर के ही गुलाम हैं खुद हुज़ूर ﷺ फरमाते हैं कि*

*हदीस* – मेरे दो वज़ीर आसमान में हैं जिब्राईल और मीकाईल

📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 208

*ⓩ वज़ीर किसके होते हैं ज़ाहिर सी बात है कि बादशाह के होते हैं,अगर हुज़ूर ﷺ फरमाते हैं कि ये दोनों मेरे वज़ीर हैं तो मतलब बादशाह आप खुद हुए,तो हुज़ूर ﷺ के लिए ये कोई कमाल की बात नहीं कि जिब्रील को देख लिया बल्कि कमाल यही है कि खुदा को देखा,फिर मोअतरिज़ का उम्मुल मोमेनीन सय्यदना आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा का ये क़ौल पेश करना कि “जो ये कहे कि हुज़ूर ﷺ ने खुदा को देखा तो वो झूठा है” ये क़ौल आपके इज्तेहाद पर था मगर यहां आपके इज्तेहाद से बड़ा हुज़ूर ﷺ का क़ौल मौजूद है कि खुद आप फरमाते हैं*

*हदीस* – मैंने अपने रब को अहसन सूरत में देखा

📕 मिश्कात,सफह 69

*ⓩ और मुनकिर का क़ुर्आन की ये दलील लाना कि खुदा को कोई आंख नहीं देख सकती तो इसका जवाब ये है कि इस दुनिया में खुदा को कोई आंख नहीं देख सकती वरना हदीसो से साबित है हुज़ूर ﷺ फरमाते हैं कि*

*हदीस* – कल तुम अपने रब को बे हिजाब देखोगे

📕 बुखारी,किताबुत तौहीद,हदीस 7443
📕 इब्ने माजा,हदीस 185

*ⓩ तो जब मैदाने महशर में तमाम मुसलमान खुदा का दीदार करेंगे तो हुज़ूर के लिए क्या मुश्किल रही,तो अब कहने वाला कह सकता है कि वो दुनिया दूसरी होगी जहां खुदा का दीदार होगा तो मोअतरिज़ का ऐतराज़ यहीं से खत्म हो गया और सवाल का जवाब खुद बा खुद मिल गया कि जहां हुज़ूर ﷺ ने खुदा का दीदार किया था वो दुनिया भी दूसरी दुनिया थी ये दुनिया नहीं थी,एक आखिरी बात ये कि जब भी कोई किसी को अपने यहां दावत पर बुलाए और मेहमान के सामने मेज़बान खुद ना आये तो इसे तौहीन समझा जाता है,उसी तरह ये बात खुदा की शान के बईद है कि वो खुद ही हुज़ूर ﷺ को बुलाये उनके लिए जन्नत सजाये जहन्नम को बुझा दे हूरो मलक का मेला लगा ले और खुद ही उनके सामने ना आये और अपना दीदार ना कराये ये ना मानने वाली बात है*

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*END*
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*Tamam sunniyon ko shabe meraj bahut bahut mubarak ho*

* Rayaj yahi hai ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ko meraj sharif rajab ki 27wi shab me hijrat se pahle makka muazzma me hazrate umme haani ke ghar se huyi

📕 Zarqaani,jild 1,safah 355

* Huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ko 34 baar meraj huyi 33 baar ruhani yaani khwab me aur 1 baar jismani yaani jaagte hue

📕 Madarejun nubuwat,jild 1,safah 288

Huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ko raat hi raat ek aan me masjide haram se masjide aksa le jaaya gaya phir wahan se saaton aasmano ki sair karayi gayi phir sidrah se aage 50000 hijaabat tai karaye gaye jannat wa dozakh dikhayi gayi aur sabse badhkar khuda ka deedar hua,magar jaisa ki munkereen ki aadat hai har baat ka inkaar karne ki to ispar bhi aitraaz kiya jaata hai ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ko meraj jism ke saath huyi hi nahin balki khwab me aisa hua,kyunki aisa ho hi nahin sakta ki koi 27 saal ka safar ek pal me kar aaye,to sawal ye hai ki agar khuda ki qudrat ka iqraar aql ke hisaab se kiya jaaye tab to ye bhi nahin ho sakta

masjide haraam yaani kaaba muazzama se baitul muqaddas ka safar karne me 1 mahine se zyada lag jaate the jiski doori 666 meel hai

1 meel = 1.60934 kilometer
666 meel = 1.60934 = 1071 kilometer
phir itna jaana aur wapas aana yaani
1071 + 1071 = 2142 kilometer

Ab ye bataiye ki 2142 kilometer ka safar agar huzoor sallallaho taala alaihi wasallam tez ghode se bhi karte to ek ghoda agar bahut tezz daude to uski speed 70 kilometer per ghante ki hogi,is hisaab se

2142 / 70 = 30.6

Aur agar oont se safar karte tab,oont ki raftaar to ghode se kam hi hoti hai,matlab ye ki 30 ghante se bhi zyada waqt lagta aapko aane aur jaane me,to agar aql ke hisaab se hi maanna hai to masjide haraam se masjide aksa ke safar ka bhi inkaar karo kyunki agar ek hi raat me huzoor sallallaho taala alaihi wasallam aasmano ki sair nahin kar sakte jannat dozakh nahin dekh sakte khuda ka deedar nahin kar sakte to phir ek hi raat me kaaba se masjide aksa bhi nahin pahunch sakte,agar wo namumkin hai to ye bhi namumkin hai,magar aisa to kar hi nahin payoge kyunki ye namumkin kaam us raat mumkin hua hai,agar inkaar karenge to kaafir ho jayenge rub taala quran me irshad farmata hai ki

* Paak hai wo zaat jo le gaya apne bande ko raat hi raat masjide haraam se masjide aksa

📕 Paara 15,surah asra,aayat 1

*Aql se faisla karne waalo tumhari aql ke parkhachche ud jayenge,agar ek mahine ka safar ek aan me ho sakta hai balki hua hai quran shahid hai to phir 27 saal ka safar bhi ek aan me ho sakta hai,agar ye mumkin hai to wo bhi mumkin hai,iske alawa teen aur daleel hai ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ko meraj huyi aur jism ke saath huyi*

1. ALLAH is aayat me farmata hai ki apne bande ko le gaya,to banda kisko kahte hain is par imaam raazi alaihirrahma farmate hain ki

* Abd ka itlaaq rooh aur jism dono par hota hai

📕 Mafatihul gaib,jild 20,safah 295

Aur iski sarahat khud quran muqaddas me maujood hai,maula farmata hai ki

* Kya tumne nahin dekha jisne mere bande ko namaz se roka

📕 Paara 30,surah alaq,aayat 9

* Aur ye ki jab ALLAH ka banda uski bandagi karne ko khada hua to qareeb tha ki wo jinn uspar thatha ki thattha ho jaayen

📕 Paara 27,surah jinn,aayat 19

Bataiye namaz rooh padhti hai ya jism ya ki dono,zaahir si baat hai ki dono,to meraj me bhi huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ka jism aur rooh dono maujood thi

2. Saari duniya jaanti hai ki meraj me huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ke liye burraq laaya gaya,agar meraj rooh ki thi to burraq ka kya kaam,kya burraq rooh ko uthaane ke liye laaya gaya tha

3. Agar huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ko meraj khwab me hoti to munkir inkaar kyun karta,kyunki khwab me aasman ki sair karna koi kamaal to nahin,matlab ye ki meraj jism ke saath hi huyi

📕 Ruhul bayan,paara 15,safah 8

*Huzoor ne khuda ka deedar kiya*

* Aankh na kisi taraf phiri aur na had se badhi

📕 Paara 27,surah najm,aayat 17

Matlab ye ki shabe meraj huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ne apne rub ko apne sar ki aankhon se dekha,usi dekhne ko maula taala farmata hai ki na to dekhne me hi aankh pheri aur na hi behosh hue,jaisa ki hazrat moosa alaihissalam rub ke jalwo ki taab na laa sake aur behosh ho gaye,aur is dekhne ki tafseel khud huzoor sallallaho taala alaihi wasallam is tarah irshad farmate hain ki

* izzat waala jabbar yahan tak qareeb hua ki 2 kamano ya usse bhi kam faasla rah gaya

📕 Bukhari,jild 2,safah 1120

* Chaaron khulfa yaani hazrat abu bakr siddiq hazrat umar faarooq hazrat usmaan gani hazrat maula ali wa abdullah ibne abbas abdullah bin haarish abi bin ka’ab abu zar gaffari maaz bin jabal abdullah ibne masood abu hurairah anas bin maalik aur bhi bahut se sahaba ka yahi mazhab hai ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ne apne sar ki aankhon se rub taala ko dekha

📕 Shifa sharif,jild 1,safah 119

* Huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ke meraj jismani ke tallauq se bukhari wa muslim wa abu daood wa ibne maaja wa shifa sharif wagairah me in jalilul qadr sahaba ikraam se hadise paak marwi hai,jinme Hazrat abu bakr siddiq umar faarooq usmaan gani maula ali abi bin ka’ab osama bin zaid anas bin maalik bilal bin hamama bilal bin sa’ad jabir bin abdullah huzaifa bin eehaan samrah bin jundab sahal bin sa’ad shaddad bin roosi habib bin sanaan abdullah bin abbas abdullah bin umar abdullah bin umru abdullah bin zubair abdullah bin oofi abdullah bin sa’ad abdullah bin masood abdurrahman bin aabis abbas bin abdul muttalib maalik bin saamad abul hamra abu aiyub ansari abu hurairah abu darda abu zar gaffari abu sayeed khudri abu sufiyaan asma bint abi bakr umme haani umme kulsum bint huzoor sallallaho taala alaihi wasallam Ummul momeneen aaysha siddiqa Ummul momeneen umme salma rizwanullahe taala alaihim ajmayeen

📕 Ruhul bayaan,paara 27,safah 168

* Iske alawa bhi deegar fuqha wa ayimma ka yahi mazhab raha ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ne khuda ka deedar kiya

📕 Almustadrak,jild 1,safah 65
📕 Fathul baari,jild 7,safah 174
📕 Khasaise kubra,jild 1,safah 161
📕 Zarqaani,jild 6,safah 118

Ab jo log ye aitraz karte hain ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ne khuda ko nahin dekha balki jibreele ameen ko dekha to to main unse kahna chahunga ki kya mere aaqa jibreel ko dekhne ke liye sidrah tashrif le gaye the,are jo khud 24000 martaba mere aaqa ki baargah me aaye hon unhein dekhna huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ke liye koi kamaal nahin,balki wo to huzoor ke hi ghulam hain khud huzoor sallallaho taala alaihi wasallam farmate hain ki

* Mere do wazeer aasman me hain jibrayeel aur meekayeel

📕 Tirmizi,jild 2,safah 208

wazeer kiske hote hain zaahir si baat hai ki baadshah ke hote hain,agar huzoor farmate hain ki ye dono mere wazeer hain to matlab baadshah aap khud hue,to huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ke liye ye koi kamaal ki baat nahin ki jibreel ko dekh liya balki kamaal yahi hai ki khuda ko dekha,phir motariz ka ummul momeneen sayyadna aaysha siddiqa raziyallahu taala anha ka ye qaul pesh karna ki “jo ye kahe ki huzoor ne khuda ko dekha to wo jhoota hai” ye qaul aapke ijtehaad par tha magar yahan aapke ijtehaad se bada huzoor ka qaul maujood hai ki khud aap farmate hain ki

* Maine apne rub ko ahsan surat me dekha

📕 Mishkat,safah 69

Aur munkir ka quran ki ye daleel laana ki khuda ko koi aankh nahin dekh sakti to iska jawab ye hai ki is duniya me khuda ko koi aankh nahin dekh sakti warna hadiso se saabit hai huzoor sallallaho taala alaihi wasallam farmate hain ki

* Kal tum apne rub ko be hijaab dekhoge

📕 Bukhari,kitabut tauheed,hadees 7443
📕 ibne maaja,hadees 185

To jab maidane mahshar me tamam musalman khuda ka deedar karenge to huzoor ke liye kya mushkil rahi,to ab kahne waala kah sakta hai ki wo duniya doosri hogi jahan khuda ka deedar hoga to motariz ka aitraz yahin se khatm ho gaya aur sawal ka jawab khud ba khud mil gaya ki jahan huzoor sallallaho taala alaihi wasallam ne khuda ka deedar kiya tha wo duniya bhi doosri duniya thi ye duniya nahin thi,ek aakhiri baat ye ki jab bhi koi kisi ko apne yahan daawat par bulaye aur mehmaan ke saamne mezbaan khud na aaye to ise tauheen samjha jaata hai,usi tarah ye baat khuda ki shaan ke bayeed hai ki wo khud hi huzoor ko bulaye unke liye jannat sajaye jahannam ko bujha de hooro malak ka mela laga le aur khud hi unke saamne na aaye aur apna deedar na karaye ye na maanne waali baat hai

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*NAUSHAD AHMAD “ZEB” RAZVI*
*ALLAHABAD*
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By Zebnews

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