Fri. Jul 23rd, 2021

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*हिन्दी/hinglish*                *ईमान और कुफ़्र*

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*हदीस* – हुज़ूर ﷺ फरमाते हैं कि ईमान ये है कि तू इस बात की गवाही दे कि अल्लाह के सिवा कोई माअबूद नहीं और मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं,और ईमान ये है कि तू खुदाए तआला और उसके रसूलों उसके फरिश्तों उसकी किताबों और क़यामत के दिन और तक़दीर पर यक़ीन रखे

📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 438

*फुक़्हा* – यानि जो बात हुज़ूर ﷺ से क़तई व यक़ीनी तौर पर साबित हो उसकी तस्दीक़ करना ईमान है और उनसे इनकार करना कुफ़्र है

📕 अशअतुल लमआत,जिल्द 1,सफह 38
📕 शरह फिक़्हे अकबर,सफह 86
📕 तफसीरे बैदावी,सफह 23

*ⓩ अहले सुन्नत वल जमाअत के सही व मुस्तनद अक़ायद जानने के लिए हुज़ूर सदरुश्शरीया मौलाना अमजद अली आज़मी अलैहिर्रहमा की किताब बहारे शरीयत हिस्सा अव्वल का मुताआला ज़रूर करें जो कि हिंदी उर्दू इंग्लिश हर ज़बान में मौजूद है,अक़ायद का पूरा मसायल एक लंबा और तवील मज़मून है जिसका यहां दर्ज कर पाना बहुत ही मुश्किल है मैं यहां कुछ मुख़्तसर ज़िक्र करता हूं*

*अल्लाह*

! अल्लाह एक है उसका कोई शरीक नहीं,ना ज़ात में ना सिफात में ना अफ़आल में ना अहकाम में और ना अस्मा में,ना उसका कोई बाप है और ना बेटा,वो अज़्ली व अब्दी है यानि जब कुछ ना था तो वो था और जब कुछ ना रहेगा तब भी वो होगा,एक उसके सिवा सब कुछ हादिस है यानि फ़ना है

! वो सबसे बे परवाह है यानि किसी का मोहताज नहीं सारा जहान उसका मोहताज है

! वो हर ऐब से पाक है मसलन झूट,दग़ा,खयानत,ज़ुल्म,जहल,बेहयाई

! वो जिस्म जिस्मानियत से पाक है मसलन हयात,क़ुदरत,सुनना,देखना,कलाम,इल्म,इरादा सब उसकी सिफ़ात है मगर इसके लिए उसे ना तो जिस्म की ज़रूरत है ना रूह की ना कान की और ना आंख की

! वो ज़माना और मकान से पाक है,लिहाज़ा उल्मा इसीलिए ऊपर वाला कहने से मना फरमाते हैं

! हर भलाई और बुराई का पैदा करने वाला वही है मगर किसी गुनाह की निस्बत उसकी तरफ करना सख़्त हिमाक़त है बल्कि अपने नफ़्स की शरारत कहें

! उसके हर काम में कसीर हिकमतें होती हैं भले ही वो हमें अच्छी लगे या बुरी,लिहाज़ा क़ुदरत के किसी भी फेअल को हमेशा अपने लिए भला ही जानें

*अम्बिया*

! किसी भी अम्बिया की शान में अदना सी गुस्ताखी या बे अदबी करना कुफ़्र है

! तमाम अंबिया मअसूम हैं यानि उनसे गुनाह का होना मुहाल यानि नामुमकिन है,और उनसे जो भी लग्ज़िशें हुई उनका ज़िक्र सिवाये क़ुर्आन की तिलावत या हदीस की रिवायत के अलावा हराम हराम और सख्त हराम है

! नुबूव्वत विलायत की तरह कसबी नहीं कि कोई भी अमल के ज़रिये नुबूव्वत हासिल कर ले,लिहाज़ा जो ऐसा जाने काफिर है

! कोई वली कितने ही बड़े मर्तबे का हो हरगिज़ किसी भी नबी की बराबरी नहीं कर सकता सो जो अपने आपको किसी नबी से बराबरी का दावा करे काफिर है

! अम्बिया की तादाद मुतअय्यन करना जायज़ नहीं कि इस मसअले पर इख़्तिलाफ बहुत हैं लिहाज़ा जो भी तादाद बताई जाए मसलन 124000 या 224000 तो वो कमो-बेश के साथ कही जाये

! हुज़ूर ﷺ खातेमुन नबीयीन हैं जो उनके बाद किसी को नुबूव्वत का मिलना जाने काफिर है

! हुज़ूर ﷺ को जिस्म ज़ाहिरी के साथ मेअराज हुई,जो मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक्सा तक के सफर का इन्कार करे काफिर है,और इससे आगे का मुनकिर गुमराह

! हुज़ूर ﷺ को हर किस्म की शफाअत हासिल है जो इन्कार करे गुमराह है

! हुज़ूर ﷺ मालिको मुख्तार हैं जो इन्कार करे काफिरो गुमराह है

*फरिश्ते*

! फरिश्ते भी मअसूम होते हैं इनके अलावा तमाम औलिया व अब्दाल गुनाह से महफूज़ होते हैं मअसूम नहीं

! किसी भी फरिश्ते की तन्कीस कुफ्र है मसलन अपने किसी दुश्मन को देखकर ये कहना कि मलकुल मौत आ गया करीब कल्मये कुफ्र है

*आसमानी किताबें*

! तमाम आसमानी किताबों पर ईमान लाना ज़रूरी है,मगर हुक्म अब सिर्फ क़ुर्आन का ही चलेगा

! जो क़ुर्आन को ना मुक़म्मल जाने काफिर है

! क़ुर्आन की आयतों से मज़ाक करना भी कुफ्र है मसलन दाढ़ी मुंडा कल्ला सौफा पेश करे या भूखा कहे कि मेरा पेट क़ुल हुवल्लाह पढ़ता है कुफ्र है

*हश्र*

! अज़ाबे क़ब्र,हश्र,जन्नत,दोज़ख सब हक़ हैं

! ये अक़ीदा रखना कि मरने के बाद रूह किसी और जिस्म में या जानवर में चली गयी है कुफ्र है

! हश्र रूह और जिस्म दोनों का होगा जो ये कहे कि अज़ाब या हिसाब सिर्फ रूह का होगा जिस्म का नहीं काफिर है

*ज़रूरियाते दीन*

! आमाले दीन मसलन किसी से नमाज़ पढ़ने को कहा और उसने जवाब दिया कि बहुत पढ़ ली कुछ नहीं होता काफिर हो गया

! रमज़ान के रोज़े रखने को कहा और जवाब दिया कि रोज़ा वो रखे जिसके घर खाने को ना हो काफिर हो गया

! यूंही एक हल्की सुन्नत मसलन नाख़ून काटने को कहा तो जवाब दिया कि नहीं काटता अगर चे सुन्नत ही क्यों ना हो काफिर हो गया

! यूंही किसी आलिम की तौहीन इसलिये की ये आलिमे दीन है कुफ्र है

! यूंही किसी काफिर के त्यौहार मसलन होली,दीवाली,राम-लीला,जन-माष्ट्मी के मेलों में शामिल होकर शानो शौकत बढ़ाना भी कुफ्र है

! यूंही किसी बदमज़हब फिरके को पसंद करना या मज़ाक में ही अपने आपको उन बातिल फिरकों का बताना कुफ़्र है

! युंहि किसी मुसलमान को काफिर कहना कुफ़्र है उसी तरह किसी काफिर को मुसलमान कहना भी कुफ़्र ही है,याद रखें कि वहाबी देवबन्दी क़ादियानी खारजी राफज़ी अहले हदीस जमाअते इस्लामी और जितने भी 72 बद-मज़हब फिरके हैं सब काफिरो मुर्तद हैं

📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 1—-79
📕 अनवारुल हदीस,सफह 90-91
📕 अहकामे शरीयत,हिस्सा 2,सफह 163

*हदीस* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि ईमान क्या है तो आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जब तुम्हें नेकी करके खुशी हो और और गुनाह करके अफसोस हो तो समझो कि तुम ईमान वाले हो

📕 मिश्कात,किताबुल ईमान,सफह 16

*ⓩ अब नेकी क्या है तो ये बताने की ज़रूरत नहीं है लेकिन गुनाह क्या है इसमें थोड़ी तफसील है क्योंकि हो सकता है जिसको एक शख्स गुनाह समझ रहा हो दूसरा उसे गुनाह न समझे,तो इसकी पहचान के लिए फरमाया गया है कि गुनाह वो है कि कोई भी ऐसा काम जिसे करने में दिल में ये खतरा पैदा हो कि पता नहीं कि ये काम करना सही है या गलत तो वो गलत ही है,क्योंकि अगर वो काम यक़ीनी तौर पर सही होता तो दिल में कभी भी ऐसा खतरा ही पैदा नहीं होता,लिहाज़ा इस तरह के हर काम को छोड़ देना ही नेकी है और कर लेना गुनाह,अब कभी ये गुनाह सग़ीरह की फेहरिस्त में होता और कभी कबीरह की,गुनाहे सग़ीरह करने के बाद कोई भी नेकी की या उससे तौबा की तो वो फौरन माफ हो जाता है लेकिन गुनाहे कबीरह सिर्फ तौबा से माफ नहीं होता मस्लन नमाज़ छोड़ी रोज़ा तर्क किया पैसा होते हुए ज़कात नहीं दी इस्तेताअत रखते हुए हज नहीं किया तो ये सब गुनाह सिर्फ तौबा से माफ नहीं होंगे बल्कि पहले इन कामों को अदा करना होगा फिर तौबा करनी होगी तो अल्लाह के फज़्लो करम से उम्मीद है कि वो माफ फरमा देगा,इसी तरह किसी को सताया किसी को मारा किसी को गाली दी किसी का पैसा हड़प लिया यानि जिस काम में आपसे किसी और का नुक्सान हुआ तो आप हुक़ूक़ुल इबाद में गिरफ्तार हो गए तो अब आपको उससे माफी भी मांगनी होगी और अल्लाह से तौबा भी करनी होगी,लेकिन किसी वजह से आप उससे माफी नहीं मांग सके मसलन वो मर गया या कहीं चला गया और आप वाक़ई शर्मिंदा हैं तो उसकी तरफ से भी नेकियां करते रहिये और दुआ करते रहिये तो इन शाअ अल्लाह तआला मौला माफ फरमा देगा*

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*END*
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*HADESS* – Huzoor ﷺ pharamaate hain ki eemaan ye hai ki too is baat kee gavaahee de ki ALLAH ke siva koee maabood nahin aur MUHAMMAD ﷺ ALLAH ke rasool hain,aur eemaan ye hai ki too khudae taaala aur uske rasoolon uske pharishton uskee kitaabon aur qayaamat ke din aur taqadeer par yaqeen rakhe

📕 Muslim,jild 1,saphah 438

*FUQHA* – Yaani jo baat huzoor ﷺ se qatayee va yaqeenee taur par saabit ho uskee tasdeeq karna eemaan hai aur unse inkaar karna kufr hai

📕 Ashatul lamaat,jild 1,saphah 38
📕 Sharah fiqhe akbar,saphah 86
📕 Tafaseere baidaavee,saphah 23

*ⓩ Ahle sunnat val jamaat ke sahee va mustanad aqaayad jaanne ke lie huzoor sadrush shareeya maulana amjad ali aazmi alaihirrahama kee kitaab bahaare shareeyat hissa avval ka mutaaala zaroor karen jo ki hindi urdu english har zabaan mein maujood hai,aqaayad ka poora masaayal ek lamba aur taveel mazmoon hai jiska yahaan darj kar paana bahut hee mushkil hai main yahaan kuchh mukhtasar zikr karta hoon*

*ALLAH*

! ALLAH ek hai uska koee shareek nahin,na zaat mein na siphaat mein na afaal mein na ahkaam mein aur na asma mein,na uska koee baap hai aur na beta,vo azlee va abdee hai yaani jab kuchh na tha to vo tha aur jab kuchh na rahega tab bhee vo hoga,ek uske siva sab kuchh haadis hai yaani fana hai

! Wo sabse be paravaah hai yaani kisee ka mohtaaj nahin saara jahaan uska mohtaaj hai

! Wo har aib se paak hai maslan jhoot,daga,khayaanat,zulm,jahal,behayaee

! Wo jism jismaniyat se paak hai maslan hayaat,qudrat,sunna,dekhna,kalaam,ilm,iraada sab uskee sifaat hai magar iske liye use na to jism kee zaroorat hai na rooh kee na kaan kee aur na aankh kee

! Wo zamaana aur makaan se paak hai,lihaaza ulma isiliye oopar vaala kahne se mana pharmaate hain

! Har bhalayee aur burayee ka paida karne vaala vahee hai magar kisee gunaah kee nisbat uskee taraph karna sakht himaaqat hai balki apne nafs kee sharaarat kahen

! Uske har kaam mein kaseer hikmaten hotee hain bhale hee vo hamen achchhi lage ya buree,lihaaza qudrat ke kisee bhee feyl ko hamesha apne liye bhala hee jaanen

*AMBIYA*

! Kisee bhee ambiya kee shaan mein adna see gustakhee ya be adbee karna kufr hai

! Tamaam ambiya maasoom hain yaani unse gunaah ka hona muhaal yaani namumkin hai,aur unse jo bhee lagzishen huee unka zikr sivaaye quraan kee tilaavat ya hadees kee rivaayat ke alaava haraam haraam aur sakht haraam hai

! Nuboovvat vilaayat kee tarah kasbee nahin ki koee bhee amal ke zariye nuboovvat haasil kar le,lihaaza jo aisa jaane kaaphir hai

! Koee valee kitane hee bade martabe ka ho hargiz kisee bhee nabee kee barabaree nahin kar sakta so jo apne aapko kisee nabee se barabaree ka daava kare kaaphir hai

! Ambiya kee taadaad mutayyan karna jaayaz nahin ki is masale par ikhtilaaph bahut hain lihaaza jo bhee taadaad batayee jaye maslan 124000 ya 224000 to vo kamo-besh ke saath kahee jaaye

! Huzoor ﷺ khaatemun nabeeyeen hain jo unke baad kisee ko nuboovvat ka milna jaane kaaphir hai

! Huzoor ﷺ ko jism zaahiree ke saath mearaaj huee,jo masjide haraam se masjide aksa tak ke safar ka inkaar kare kaaphir hai,aur isase aage ka munkir gumraah

! Huzoor ﷺ ko har kism kee shaphaat haasil hai jo inkaar kare gumraah hai

! Huzoor ﷺ maaliko mukhtaar hain jo inkaar kare kaafiro gumraah hai

*FARISHTE*

! Farishte bhee maasoom hote hain inke alaava tamaam auliya va abdaal gunaah se mahphooz hote hain maasoom nahin

! Kisee bhee farishte kee tankees kuphr hai maslan apne kisee dushman ko dekhkar ye kahna ki malkul maut aa gaya kareeb kalmaye kuphr hai

*AASMANI KITABEIN*

! Tamaam aasmani kitaabon par eemaan laana zarooree hai,magar hukm ab sirph quraan ka hee chalega

! Jo quraan ko na muqammal jaane kaaphir hai

! Quraan kee aayton se mazaak karna bhee kuphr hai maslan daadhee munda kalla saupha pesh kare ya bhookha kahe ki mera pet qul huvallaah padhta hai kuphr hai

*HASHR*

! Azaabe qabr,hashr,jannat,dozakh sab haq hain

! Ye aqeeda rakhana ki marne ke baad rooh kisee aur jism mein ya jaanvar mein chalee gayee hai kuphr hai

! Hashr rooh aur jism dono ka hoga jo ye kahe ki azaab ya hisaab sirph rooh ka hoga jism ka nahin kaaphir hai

*ZARURIYATE DEEN*

! Aamaale deen maslan kisee se namaaz padhne ko kaha aur usne javaab diya ki bahut padh lee kuchh nahin hota kaaphir ho gaya

! Ramzan ke roze rakhne ko kaha aur javaab diya ki roza vo rakhe jiske ghar khaane ko na ho kaaphir ho gaya

! Yunhi ek halkee sunnat maslan naakhoon kaatne ko kaha to javaab diya ki nahin kaatta agar che sunnat hee kyon na ho kaaphir ho gaya

! Yunhi kisee aalim kee tauheen isliye kee ye aalime deen hai kuphr hai

! Yunhi kisee kaaphir ke tyauhaar maslan holi,diwali,raam-leela,jan-maashtmee ke melon mein shaamil hokar shaano shaukat badhaana bhee kuphr hai

! Yunhi kisee badmazahab phirake ko pasand karna ya mazaak mein hee apne aapko un baatil phirkon ka bataana kufr hai

! Yunhi kisee musalmaan ko kaaphir kahna kufr hai usee tarah kisee kaaphir ko musalmaan kahna bhee kufr hee hai,yaad rakhen ki vahaabee devabandee qaadiyaanee khaarajee raaphazee ahale hadees jamaate islaamee aur jitne bhee 72 bad-mazhab phirke hain sab kaaphiro murtad hain

📕 Bahaare shareeyat,hissa 1,saphah 1-79
📕 Anvaarul hadees,saphah 90-91
📕 Ahkaame shareeyat,hissa 2,saphah 163

*HADEES* – Huzoor sallallahu taala alaihi wasallam se poochha gaya ki imaan kya hai to aap sallallahu taala alaihi wasallam irshaad farmate hain ki jab tumhein neki karke khushi ho aur aur gunaah karke afsos ho to samjho ki tum imaan waale ho

📕 Mishkat,kitabul imaan,safah 16

*ⓩ Ab neki kya hai to ye batane ki zarurat nahin lekin gunaah kya hai isme thodi tafseel hai kyunki ho sakta hai jisko ek shakhs gunaah samajh raha ho doosra use gunaah na samjhe,to iske liye farmaya gaya hai ki gunah wo hai ki koi bhi aisa kaam jise karne me dil me ye khatra paida ho ki pata nahin ki ye kaam karna sahi hai ya galat to wo galat hi hai,kyunki agar wo kaam yaqeeni taur par sahi hota to dil me kabhi bhi aisa khatra hi paida nahin hota,lihaza is tarah ke har kaam ko chhod dena hi neki hai aur kar lena gunaah,ab kabhi ye gunaah sagirah ki fehrist me hota aur kabhi kabirah ki,gunahe sagirah karne ke baad koi bhi neki ki ya usse tauba ki to wo fauran maaf ho jaata hai lekin gunahe kabirah sirf tauba se maaf nahin hota maslan namaz chhodi roza tark kiya paisa hote hue zakat nahin di iste’at rakhte hue hajj nahin kiya to ye sab gunaah sirf tauba se maaf nahin honge balki pahle in kamao ko ada karna hoga phir tauba karni hogi to ALLAH ke fazlo karam se ummeed hai ki wo maaf farma dega,isi tarah kisi ko sataya kisi ko maara kisi ko gaali di kisi ka paisa hadap liya yaani jis kaam me aapse kisi aur ka nuksaan hua to aap huququl ibaad me giraftaar ho gaye to ab aapko usse maafi bhi maangni hogi aur ALLAH se tauba bhi karni hogi,lekin kisi wajah se aap usse maafi nahin maang sake maslan wo mar gaya ya kahin chala gaya aur aap waqayi sharminda hain to uski taraf se bhi nekiyan karte rahiye ya dua karte rahiye to in shaw ALLAH taala maula maaf farma dega*

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*NAUSHAD AHMAD “ZEB” RAZVI*
*ALLAHABAD*
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By Zebnews

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