Fri. Jul 23rd, 2021

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*हिन्दी/hinglish*        *हुज़ूर मालिको मुख्तार हैं*
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*ⓩ इस मसअले पर भी वहाबी अपनी जिहालत दिखाता रहता है और आये दिन सुन्नियों को कुछ ऐसी दलीलों को बता बताकर बहकाता रहता है मसलन नबी ﷺ को अगर इख़्तियार होता तो अपने चचा अबू तालिब से इतनी मुहब्बत रखने के बावजूद क्यों उनको ईमान नहीं दिलवा पाये” इसी तरह कि और भी कुछ बातें हैं जो अक्सर बेशतर सुनने में आती रहती है,बेशक आक़ा-ए करीम ﷺ अल्लाह की अता से मालिको मुख़्तार हैं,वो जिसे जो चाहें अता कर दें और जिससे जो चाहें छीन लें और क़ुर्आनो हदीस उनके इख़्तियार की दलीलों से भरा है,कुछ झलकियां मुलाहज़ा फरमायें*

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि “निकाह में लाओ जो औरतें तुमको खुश आयें दो दो तीन तीन और चार चार” मतलब ये कि मौला तआला ने तमाम मुसलमानों को ये हुक्म दिया है कि अगर सबमें बराबर इंसाफ कर सको तो 4 बीवियां एक साथ रख सकते हो वरना एक ही काफी है,और ये क़ानून सब के लिए बराबर है और क़यामत तक के लिए है,मगर इसके खिलाफ जब हुज़ूर ﷺ ने अपनी प्यारी बेटी हज़रते फातिमा ज़ुहरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा का निकाह मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से किया तो फरमाया कि ऐ अली जब तक फातिमा तुम्हारे निक़ाह में है तुमको दूसरा निकाह हराम है,और हैरत तो इस बात पर है कि आपके इस फैसले के खिलाफ ना तो मौला अली ने कुछ कहा और ना तो किसी सहाबी ने,और तो और खुद रब्बे ज़ुल्जलाल ने भी ऐतराज़ नहीं किया कि ऐ महबूब ﷺ हम तो चार औरतों को एक साथ रखने का हुक्म दे रहे हैं और आप दूसरी को ही हराम किये देते हैं,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 पारा 4,सूरह निसा,आयत 3
📕 मिश्कात,बाबुल मनाक़िबे अहले बैत

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि “और दो गवाह कर लो मर्दों में से” यानि शरई गवाही के लिए 2 मुसलमान आक़िल बालिग़ मुत्तक़ी होने चाहिये ये फरमान क़ुर्आन का है,मगर हुज़ूर ﷺ ने हज़रते खुज़ैमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की अकेले की गवाही को 2 मुसलमान मर्दों की गवाही के बराबर क़रार दिया,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 पारा 3,सूरह बक़र,आयत 282
📕 खसाइसे कुबरा,जिल्द 2,सफह 263

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि “किसी मुसलमान मर्द व औरत को ये हक़ नहीं पहुंचता कि जब अल्लाह व रसूल कुछ हुक्म फरमा दें तो उन्हें अपने मामले का कुछ इख़्तियार रहे” वाक़िया ये हुआ कि हुज़ूर ﷺ ने अपने ग़ुलाम हज़रत ज़ैद बिन हारिस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के निकाह का पैग़ाम हज़रत ज़ैनब बिन्त हजश रज़ियल्लाहु तआला अन्ह को दिया जिस पर उन्होंने इन्कार कर दिया,इस पर ये आयत उतरी और हज़रत ज़ैनब को निकाह करना पड़ा,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 पारा 22,सूरह अहज़ाब,आयत 36
📕 खज़ाईनुल इरफान,सफह 502

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि “हम देख रहे हैं बार बार तुम्हारा आसमान की तरफ मुंह करना तो ज़रूर हम तुम्हें फेर देंगे उस क़िब्ले की तरफ जिसमे तुम्हारी खुशी है,अभी अपना मुंह फेर दो मस्जिदें हराम की तरफ” वाक़िया ये हुआ कि शुरू इस्लाम में 16 या 17 महीने बैतुल मुक़द्दस ही मुसलमानो का क़िब्ला रहा और इस बात पर यहूदी मुसलमानों को ताना देते थे कि हर काम तो अपना हमसे जुदा करते हैं और नमाज़ हमारे क़िब्ला की जानिब मुंह करके पढ़ते हैं,मगर अचानक एक दिन कुछ यहूदियों ने हुज़ूर ﷺ को इस अंदाज़ में लअन तअन किया कि जिसका आपके क़ल्ब पर बेहद असर हुआ और आप रंजीदा हो गये,आप इसी हालत में मस्जिदे क़िब्लतैन में नमाज़ को हाज़िर हुए और हालते नमाज़ में बार बार आसमान की जानिब देखते जाते कि शायद अब जिब्रील वही लेकर आते होंगे,आखिरकार रब की रहमत जोश में आई और अपने महबूब ﷺ की खुशी के लिए ऐन नमाज़ की हालत में ही क़िब्ले को बदलने का हुक्म फरमाया इसीलिए उस मस्जिद को मस्जिदे क़िब्लतैन यानि दो क़िब्लों वाली मस्जिद कहा जाता है,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 144
📕 सीरते मुस्तफा,सफह 156

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – दिन भर में 5 वक़्त की नमाज़ फर्ज़ है अगर कोई इंकार करे तो काफिर हो जायेगा मगर एक सहाबी इस शर्त पर ईमान लाये कि वो दिन भर में सिर्फ 2 वक़्त की ही नमाज़ पढ़ेंगे और हुज़ूर ﷺ ने उन्हें इजाज़त अता फरमाई,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 सल्तनते मुस्तफा,सफह 27

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – जब हज फर्ज़ हुआ तो एक सहाबी ने कहा कि क्या हज हर साल फर्ज़ है इस पर हुज़ूर ﷺ फरमाते हैं कि अगर हम हां कह दें तो हर साल फर्ज़ हो जायेगा,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 मिश्कात,बाबुल हज,सफह 222

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – एक सहाबी ने रमज़ान में रोज़े की हालत में अपनी बीवी से सोहबत कर ली तो सरकार ﷺ ने उन पर कफ्फारह लाज़िम फरमाया कि 60 रोज़े लगातार रखो,उन्होंने माज़रत चाही फिर आपने कहा कि 60 मिस्कीन को खाना खिलाओ या कपड़े पहनाओ,इस पर वो बोले कि मेरी इतनी हैसियत नहीं है तो हुज़ूर ﷺ ने उन्हें कुछ देर रुकने को कहा और कुछ देर में ही हुज़ूर ﷺ के पास एक टोकरी खजूर हदिये में आया,आपने उन सहाबी से फरमाया कि इसे ले जा और गरीबों में बांट दे,तो वो कहते हैं कि हुज़ूर ﷺ मदीने में मुझसे ज़्यादा ग़रीब कोई नहीं है तो आप ﷺ मुस्कुरा देते हैं और फरमाते हैं कि ठीक है इसे ले जा खुद खा और अपने घर वालों को खिला तेरा कफ्फारह अदा हो जायेगा,पूरी दुनिया में आज तक कभी ऐसा कफ्फारह अदा नहीं हुआ और न क़यामत तक कभी ऐसा होगा कि खुद को ही खिलाकर कफ्फारह अदा करा दिया हो,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 260

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – क़ुर्बानी के लिए बकरा बकरी की उम्र 1 साल मुतय्यन है कि अगर इसमें एक दिन भी कम होगा तो जानवर हलाल है मगर क़ुर्बानी हरगिज़ न होगी,मगर अबु दर्दा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को 6 माह के बकरी के बच्चे को क़ुर्बानी के लिए इजाज़त अता फरमाई,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 834

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की अस्र की नमाज़ क़ज़ा हो गई जिस पर हुज़ूर ﷺ ने डूबे हुए सूरज को ही वापस लौटा दिया कि अली अपनी नमाज़ अदा फरमा लें,सूरज सूरज है कोई चराग़ नहीं कि बुझ गया तो फिर से जला लिया मगर हुज़ूर ﷺ के लिए सूरज की औक़ात भी एक चराग़ से ज़्यादा नहीं रही कि डूबने के बाद भी उसे वापस बुला लिया,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 कंज़ुल उम्माल,जिल्द 2,सफह 277

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – एक आराबी आप ﷺ की खिदमत में हाज़िर हुआ और बोला कि मुझे कुछ मोजज़ा दिखायें तो मैं ईमान ले आऊं,इस पर आप ﷺ फरमाते हैं कि जा और जाकर उस दरख़्त से कह कि तुझे अल्लाह के रसूल ﷺ बुलाते हैं,जैसे ही उस आराबी ने जाकर उस पेड़ से ये कहा फौरन वो दरख़्त अपनी जड़ों को घसीटता हुआ हुज़ूर ﷺ की बारगाह में हाज़िर हो गया ये देखकर आराबी फौरन ईमान ले आया,अंधे नज्दी देखले क़ुदरत रसूल अल्लाह की ﷺ,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 203

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – एक मर्तबा अबु जहल ने हुज़ूर ﷺ से कहा कि अगर आप नबी हैं तो चांद के दो टुकड़े करके दिखाईये इस पर आप ﷺ ने उंगली के इशारे से चांद के दो टुकड़े फरमा दिये,और इसका गवाह खुद क़ुर्आने मुक़द्दस बना “पास आई क़यामत और शक हो गया चांद” ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 पारा 27,सूरह क़मर,आयत 1-2
📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 546

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – सुलह हुदैबिया के मौक़े पर जब सहाबियों के पास पानी खत्म हो गया तो सब हुज़ूर ﷺ के पास इस्तिगासा लेकर पहुंचे,इस पर आप ﷺ ने एक प्याले में अपनी उंगलियां मुबारक डुबो दी तो फौरन उसमें से पानी उबलने लगा हज़रते जाबिर फरमाते हैं कि हम 1500 की तादाद में थे और उस पानी ने सबको किफायत किया,फुक़्हा फरमाते हैं कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने पत्थर पर असा मारकर पानी निकाला हालांकि वो कोई कमाल नहीं था कि पत्थर से पानी निकलता ही है मगर उंगलियों की खाईयों से पानी निकालना ये अपने आप में एक अज़ीम मोजज़ा है,इससे साबित होता है कि अल्लाह ने हुज़ूर ﷺ के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं रखा,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 505

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – हज़रत अब्दुल्लाह बिन उबैक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की पिण्डली टूट गयी तो आप ﷺ ने उस पर अपना दस्ते करम फेरा तो फौरन वो पिण्डली पहले जैसी हो गयी,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 577

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की दुखती हुई आंख में अपना लोआबे दहन डाला तो फौरन उनकी आंख अच्छी हो गयी,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 525

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – हुज़ूर ﷺ फरमाते हैं कि अगर मैं चाहूं तो ये पहाड़ सोने के बनकर मेरे साथ साथ चलें,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 मिश्कात,सफह 521

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि मैं अक्सर हदीसें सुनकर भूल जाता था,एक मर्तबा मैंने ये बात हुज़ूर ﷺ को बताई तो आपने फरमाया कि अपनी चादर फैलाओ तो मैंने फैला दी फिर हुज़ूर ﷺ ने अपने दोनों हाथों को मिलाकर चुल्लु से कुछ डाला और कहा कि इसे अपने सीने से लगा लो तो मैंने ऐसा ही किया और उसके बाद से मैं कभी कोई बात नहीं भूला,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 515

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – जंगे खन्दक के रोज़ हज़रते जाबिर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने 4 किलो जौ और एक बकरी का बच्चा ज़बह करके हुज़ूर ﷺ की दावत की,और हुज़ूर ﷺ अपने साथ 1000 असहाब को लेकर पहुंच गये,और हज़रते जाबिर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बीवी से फरमाया कि इस गोश्त की हांडी को चूल्हे से ना उतरना और रोटी बनाने के लिए एक और औरत को बुलालो ये कहकर आपने आटे में और हांडी में अपना लोआबे दहन डाल दिया,हज़रते जाबिर फरमाते हैं कि सबने खाना खाया और फिर भी गुंधा हुआ आटा और हांडी में गोश्त वैसा कि वैसा ही रहा और कुछ कमी ना हुई,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 589

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – एक जंग के मौके पर जब कि खाने के सामान की तंगी हुई तो हुज़ूर ﷺ ने 21 दाने खजूर पर कुछ पढ़कर दम किया और दस्तर ख्वान पर डाल दिया सबने शिकम सैर होकर खाया मगर खजूरें वैसी ही दस्तर ख्वान पर मौजूद रहीं,फिर आप ﷺ ने उन्हें एक पोटली में डालकर हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को दे दिया और कहा कि जब भी तुम्हे खजूरों की ज़रूरत हो इसमें से हाथ डालकर निकाल लेना मगर कभी पलटना मत,हज़रत अब हुरैरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि मैंने ज़िन्दगी भर में उससे 120 कुन्टल खजूरें बरामद की मगर एक जंग के मौके पर वो थैली मुझसे कहीं ग़ुम हो गयी,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 खसाइसे कुबरा,जिल्द 2,सफह 51

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – मर्द को सोना पहनना हराम है मगर आप ﷺ ने हज़रते सुराक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को सोने के कंगन पहनना जायज़ फरमाया,ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ

📕 सल्तनते मुस्तफा,सफह 31

*इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ* – अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि “अल्लाह का तुम पर बड़ा फज़्ल है” हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को पूरी दुनिया पर यानि इंसानों पर जानवरों पर खुशकी पर तरी पर हवा पर हुक़ूमत बख्शी मगर ये ना फरमाया कि मैंने सुलेमान पर फज़्ल किया मगर हुज़ूर ﷺ को फरमाता है कि मैंने आप पर फज़्ल किया,दूसरी जगह इरशाद फरमाता है कि “और तुम्हें हाजत मंद पाया तो ग़नी कर दिया” अब जिसको रब ग़नी करदे उसके ग़िना का अंदाज़ा कौन लगा सकता है,मगर ये वहाबी कोढ़ी वो हैं कि जिसकी मिसाल उस मक्खी की तरह है जो पूरा खूबसूरत जिस्म छोड़कर ज़ख्म पर ही बैठा करती है,ठीक उसी तरह ये खबीस भी तमाम आयतों और हदीसों को छोड़कर सिर्फ उन आयतों और हदीसों की तरफ रुजू करते हैं जिनमे उन्हें हुज़ूर ﷺ की शान में कमी निकालने का कुछ मौक़ा मिले,हालांकि ऐसी कोई आयत और कोई हदीस नहीं जिससे कि हुज़ूर ﷺ की तनक़ीस होती हो मगर ये जाहिल उसका गलत मतलब निकालकर लोगों में फितना फैलाते हैं जैसा कि वो बात जो मौज़ूये बहस थी,याद रखिये ईमान और कुफ़्र का तअल्लुक़ क़ल्ब से है मगर इख्तियार खुद का होता है,जिसने जो मांगा नबी ﷺ ने हर उस शख्स को हर वो चीज़ दी पर अबू तालिब ने कभी भी ईमान को मुक़द्दम ना समझा इसी लिये ईमान उनसे दूर ही रहा,और रही बात एहसान की कि जो उन्होने मेरे आक़ा ﷺ के साथ किया तो बुखारी शरीफ की रिवायत है कि सफरे मेअराज मे आप ﷺ ने अपने चचा अबु तालिब को जहन्नम की आग मे पाया तो आपसे रहा ना गया और फरमाते हैं कि मैने उनका अज़ाब यहां तक कम किया कि सिर्फ उनके टख्नों तक रह गया ये है इख़्तियारे मुस्तफा ﷺ और ये हुज़ूर ﷺ पर एहसान का बदला था

📕 पारा 5,सूरह निसा,आयत 113
📕 पारा 30,सूरह वद्दोहा,आयत 8
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 114
📕 ईमाने अबू तालिब,सफह 20

*ⓩ यहां जो कुछ लिखा वो मेरे मुस्तफा जाने रहमत ﷺ के इख्तियार का बस एक हर्फ है,पूरा ना तो मैं यहां लिख सकता हूं और ना आप पढ़ सकते हैं,मगर ईमान वालों के लिये उनकी शान को समझने के लिये एक हर्फ ही काफी है और बे ईमान के लिये पूरी क़ुर्आनो हदीस भी कम है*

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*ⓩ Is masle par bhee vahaabee apanee jihaalat dikhaata rahata hai aur aaye din sunniyon ko kuchh aisee daleelon ko bata bataakar bahakaata rahata hai masalan nabee ﷺ ko agar ikhtiyaar hota to apane chacha aboo taalib se itanee muhabbat rakhane ke baavajood kyon unako eemaan nahin dilava paaye” isee tarah ki aur bhee kuchh baaten hain jo aksar beshatar sunane mein aatee rahatee hai,beshak aaqa-e kareem ﷺ ALLAH kee ata se maaliko mukhtaar hain,vo jise jo chaahen ata kar den aur jisase jo chaahen chheen len aur quraano hadees unake ikhtiyaar kee daleelon se bhara hai,kuchh jhalakiyaan mulaahaza pharamaayen*

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – ALLAH rabbul izzat quraan muqaddas mein irashaad pharamaata hai ki “nikaah mein lao jo auraten tumako khush aayen do do teen teen aur chaar chaar” matalab ye ki maula taaala ne tamaam musalamaanon ko ye hukm diya hai ki agar sabamen baraabar insaaph kar sako to 4 beeviyaan ek saath rakh sakate ho varana ek hee kaaphee hai,aur ye qaanoon sab ke lie baraabar hai aur qayaamat tak ke lie hai,magar isake khilaaph jab huzoor ﷺ ne apanee pyaaree betee hazarate phaatima zuhara raziyallaahu taaala anha ka nikaah maula alee raziyallaahu taaala anhu se kiya to pharamaaya ki ai alee jab tak phaatima tumhaare niqaah mein hai tumako doosara nikaah haraam hai,aur hairat to is baat par hai ki aapake is phaisale ke khilaaph na to maula alee ne kuchh kaha aur na to kisee sahaabee ne,aur to aur khud rabbe zuljalaal ne bhee aitaraaz nahin kiya ki ai mahaboob ﷺ ham to chaar auraton ko ek saath rakhane ka hukm de rahe hain aur aap doosaree ko hee haraam kiye dete hain,ye hai ikhtiyaare mustapha ﷺ

📕 Paara 4,soorah nisa,aayat 3
📕 Mishkaat,baabul manaaqibe ahale bait

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – ALLAH rabbul izzat quraan muqaddas mein irashaad pharamaata hai ki “aur do gavaah kar lo mardon mein se” yaani sharee gavaahee ke lie 2 musalamaan aaqil baalig muttaqee hone chaahiye ye pharamaan quraan ka hai,magar huzoor ﷺ ne hazarate khuzaima raziyallaahu taaala anhu kee akele kee gavaahee ko 2 musalamaan mardon kee gavaahee ke baraabar qaraar diya,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Paara 3,soorah baqar,aayat 282
📕 Khasaise kubara,jild 2,saphah 263

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – ALLAH rabbul izzat quraan muqaddas mein irashaad pharamaata hai ki “kisee musalamaan mard va aurat ko ye haq nahin pahunchata ki jab allaah va rasool kuchh hukm pharama den to unhen apane maamale ka kuchh ikhtiyaar rahe” vaaqiya ye hua ki huzoor ne apane gulaam hazarat zaid bin haaris raziyallaahu taaala anhu ke nikaah ka paigaam hazarat zainab bint hajash raziyallaahu taaala anh ko diya jis par unhonne inkaar kar diya,is par ye aayat utaree aur hazarat zainab ko nikaah karana pada,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Paara 22,soorah ahazaab,aayat 36
📕 Khazaeenul iraphaan,saphah 502

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – ALLAH rabbul izzat quraan muqaddas mein irashaad pharamaata hai ki “ham dekh rahe hain baar baar tumhaara aasamaan kee taraph munh karana to zaroor ham tumhen pher denge us qible kee taraph jisame tumhaaree khushee hai,abhee apana munh pher do masjiden haraam kee taraph” vaaqiya ye hua ki shuroo islaam mein 16 ya 17 maheene baitul muqaddas hee musalamaano ka qibla raha aur is baat par yahoodee musalamaanon ko taana dete the ki har kaam to apana hamase juda karate hain aur namaaz hamaare qibla kee jaanib munh karake padhate hain,magar achaanak ek din kuchh yahoodiyon ne huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ko is andaaz mein laan taan kiya ki jisaka aapake qalb par behad asar hua aur aap ranjeeda ho gaye,aap isee haalat mein masjide qiblatain mein namaaz ko haazir hue aur haalate namaaz mein baar baar aasamaan kee jaanib dekhate jaate ki shaayad ab jibreel vahee lekar aate honge,aakhirakaar rab kee rahamat josh mein aaee aur apane mahaboob kee khushee ke lie ain namaaz kee haalat mein hee qible ko badalane ka hukm pharamaaya iseelie us masjid ko masjide qiblatain yaani do qiblon vaalee masjid kaha jaata hai,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Paara 2,soorah baqar,aayat 144
📕 Seerate mustapha,saphah 156

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Din bhar mein 5 vaqt kee namaaz pharz hai agar koee inkaar kare to kaaphir ho jaayega magar ek sahaabee is shart par eemaan laaye ki vo din bhar mein sirph 2 vaqt kee hee namaaz padhenge aur huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ne unhen ijaazat ata pharamaee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Saltanate mustapha,saphah 27

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Jab haj pharz hua to ek sahaabee ne kaha ki kya haj har saal pharz hai is par huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam pharamaate hain ki agar ham haan kah den to har saal pharz ho jaayega,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Mishkaat,baabul haj,saphah 222

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Ek sahaabee ne ramazaan mein roze kee haalat mein apanee beevee se sohabat kar lee to sarakaar sallalalaahu taaala alaihi vasallam ne un par kaphphaarah laazim pharamaaya ki 60 roze lagaataar rakho,unhonne maazarat chaahee phir aapane kaha ki 60 miskeen ko khaana khilao ya kapade pahanao,is par vo bole ki meree itanee haisiyat nahin hai to huzoor ne unhen kuchh der rukane ko kaha aur kuchh der mein hee huzoor ke paas ek tokaree khajoor hadiye mein aaya,aapane un sahaabee se pharamaaya ki ise le ja aur gareebon mein baant de,to vo kahate hain ki huzoor madeene mein mujhase zyaada gareeb koee nahin hai to aap sallalalaahu taaala alaihi vasallam muskura dete hain aur pharamaate hain ki theek hai ise le ja khud kha aur apane ghar vaalon ko khila tera kaphphaarah ada ho jaayega,pooree duniya mein aaj tak kabhee aisa kaphphaarah ada nahin hua aur na qayaamat tak kabhee aisa hoga ki khud ko hee khilaakar kaphphaarah ada kara diya ho,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 1,saphah 260

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Qurbaanee ke lie bakara bakaree kee umr 1 saal mutayyan hai ki agar isamen ek din bhee kam hoga to jaanavar halaal hai magar qurbaanee haragiz na hogee,magar abu darda raziyallaahu taaala anhu ko 6 maah ke bakaree ke bachche ko qurbaanee ke lie ijaazat ata pharamaee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 2,saphah 834

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Maula Ali raziyallaahu taaala anhu kee asr kee namaaz qaza ho gaee jis par huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ne doobe hue sooraj ko hee vaapas lauta diya ki alee apanee namaaz ada pharama len,sooraj sooraj hai koee charaag nahin ki bujh gaya to phir se jala liya magar huzoor ke lie sooraj kee auqaat bhee ek charaag se zyaada nahin rahee ki doobane ke baad bhee use vaapas bula liya,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Kanzul ummaal,jild 2,saphah 277

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Ek aaraabee aapakee khidamat mein haazir hua aur bola ki mujhe kuchh mojaza dikhaayen to main eemaan le aaoon,is par aap pharamaate hain ki ja aur jaakar us darakht se kah ki tujhe allaah ke rasool sallalalaahu taaala alaihi vasallam bulaate hain,jaise hee us aaraabee ne jaakar us ped se ye kaha phauran vo darakht apanee jadon ko ghaseetata hua huzoor kee baaragaah mein haazir ho gaya ye dekhakar aaraabee phauran eemaan le aaya,andhe najdee dekhle qudarat Rasool ALLAH kee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Tirmizee,jild 2,saphah 203

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Ek martaba abu jahal ne huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam se kaha ki agar aap nabee hain to chaand ke do tukade karake dikhaeeye is par aapane ungalee ke ishaare se chaand ke do tukade pharama diye,aur isaka gavaah khud quraane muqaddas bana “paas aaee qayaamat aur shak ho gaya chaand” ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Paara 27,soorah qamar,aayat 1-2
📕 Bukhaaree,jild 1,saphah 546

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Sulah hudaibiya ke mauqe par jab sahaabiyon ke paas paanee khatm ho gaya to sab huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ke paas istigaasa lekar pahunche,is par aapane ek pyaale mein apanee ungaliyaan mubaarak dubo dee to phauran usamen se paanee ubalane laga hazarate jaabir pharamaate hain ki ham 1500 kee taadaad mein the aur us paanee ne sabako kiphaayat kiya,phuqha pharamaate hain ki hazarat moosa alaihissalaam ne patthar par asa maarakar paanee nikaala haalaanki vo koee kamaal nahin tha ki patthar se paanee nikalata hee hai magar ungaliyon kee khaeeyon se paanee nikaalana ye apane aap mein ek azeem mojaza hai,isase saabit hota hai ki allaah ne huzoor ke lie kuchh bhee naamumakin nahin rakha,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 1,saphah 505

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Hazarat abdullaah bin ubaik raziyallaahu taaala anhu kee pindalee toot gayee to aapane us par apana daste karam phera to phauran vo pindalee pahale jaisee ho gayee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 2,saphah 577

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Maula Ali raziyallaahu taaala anhu kee dukhatee huee aankh mein apana loaabe dahan daala to phauran unakee aankh achchhee ho gayee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 1,saphah 525

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam pharamaate hain ki agar main chaahoon to ye pahaad sone ke banakar mere saath saath chalen,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Mishkaat,saphah 521

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Hazarat abu huraira raziyallaahu taaala anhu pharamaate hain ki main aksar hadeesen sunakar bhool jaata tha,ek martaba mainne ye baat huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ko bataee to aapane pharamaaya ki apanee chaadar phailao to mainne phaila dee phir huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ne apane donon haathon ko milaakar chullu se kuchh daala aur kaha ki ise apane seene se laga lo to mainne aisa hee kiya aur usake baad se main kabhee koee baat nahin bhoola,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 1,saphah 515

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Jange khandak ke roz hazarate jaabir raziyallaahu taaala anhu ne 4 kilo jau aur ek bakaree ka bachcha zabah karake huzoor kee daavat kee,aur huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam apane saath 1000 asahaab ko lekar pahunch gaye,aur hazarate jaabir raziyallaahu taaala anhu kee beevee se pharamaaya ki is gosht kee haandee ko choolhe se na utarana aur rotee banaane ke lie ek aur aurat ko bulaalo ye kahakar aapane aate mein aur haandee mein apana loaabe dahan daal diya,hazarate jaabir pharamaate hain ki sabane khaana khaaya aur phir bhee gundha hua aata aur haandee mein gosht vaisa ki vaisa hee raha aur kuchh kamee na huee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Bukhaaree,jild 2,saphah 589

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Ek jang ke mauke par jab ki khaane ke saamaan kee tangee huee to huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam ne 21 daane khajoor par kuchh padhakar dam kiya aur dastar khvaan par daal diya sabane shikam sair hokar khaaya magar khajooren vaisee hee dastar khvaan par maujood raheen,phir aapane unhen ek potalee mein daalakar hazarat abu huraira raziyallaahu taaala anhu ko de diya aur kaha ki jab bhee tumhe khajooron kee zaroorat ho isamen se haath daalakar nikaal lena magar kabhee palatana mat,hazarat ab huraira raziyallaahu taaala anhu pharamaate hain ki mainne zindagee bhar mein usase 120 kuntal khajooren baraamad kee magar ek jang ke mauke par vo thailee mujhase kaheen gum ho gayee,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Khasaise kubara,jild 2,saphah 51

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – Mard ko sona pahanana haraam hai magar aap sallalalaahu taaala alaihi vasallam ne hazarate suraaqa raziyallaahu taaala anhu ko sone ke kangan pahanana jaayaz pharamaaya,ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam

📕 Saltanate mustapha,saphah 31

*IKHTIYARE MUSTAFA ﷺ* – ALLAH rabbul izzat quraan muqaddas mein irashaad pharamaata hai ki “allaah ka tum par bada phazl hai” hazarat sulemaan alaihissalaam ko pooree duniya par yaani insaanon par jaanavaron par khushakee par taree par hava par huqoomat bakhshee magar ye na pharamaaya ki mainne sulemaan par phazl kiya magar huzoor ko pharamaata hai ki mainne aap par phazl kiya,doosaree jagah irashaad pharamaata hai ki “aur tumhen haajat mand paaya to ganee kar diya” ab jisako rab ganee karade usake gina ka andaaza kaun laga sakata hai,magar ye vahaabee kodhee vo hain ki jisakee misaal us makkhee kee tarah hai jo poora khoobasoorat jism chhodakar zakhm par hee baitha karatee hai,theek usee tarah ye khabees bhee tamaam aayaton aur hadeeson ko chhodakar sirph un aayaton aur hadeeson kee taraph rujoo karate hain jiname unhen huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam kee shaan mein kamee nikaalane ka kuchh mauqa mile,haalaanki aisee koee aayat aur koee hadees nahin jisase ki huzoor sallalalaahu taaala alaihi vasallam kee tanaqees hotee ho magar ye jaahil usaka galat matalab nikaalakar logon mein phitana phailaate hain jaisa ki vo baat jo mauzooye bahas thee,yaad rakhiye eemaan aur kufr ka taalluq qalb se hai magar ikhtiyaar khud ka hota hai,jisane jo maanga nabee ne har us shakhs ko har vo cheez dee par aboo taalib ne kabhee bhee eemaan ko muqaddam na samajha isee liye eemaan unase door hee raha,aur rahee baat ehasaan kee ki jo unhone mere aaqa sallalalaahu taaala alaihi vasallam ke saath kiya to bukhaaree shareeph kee rivaayat hai ki saphare mearaaj me aapane apane chacha abu taalib ko jahannam kee aag me paaya to aapase raha na gaya aur pharamaate hain ki maine unaka azaab yahaan tak kam kiya ki sirph unake takhnon tak rah gaya ye hai ikhtiyaare mustapha sallalalaahu taaala alaihi vasallam aur ye huzoor par ehasaan ka badala tha,yahaan jo kuchh likha vo mere mustapha jaane rahamat sallalalaaho taaala alaihi vasallam ke ikhtiyaar ka bas ek harph hai,poora na to main yahaan likh sakata hoon aur na aap padh sakate hain,magar eemaan vaalon ke liye unakee shaan ko samajhane ke liye ek harph hee kaaphee hai aur be eemaan ke liye pooree quraano hadees bhee kam hai

📕 Paara 5,soorah nisa,aayat 113
📕 Paara 30,soorah vaddoha,aayat 8
📕 Muslim,jild 1,safah 115
📕 Imaane Abu talib,safah 20

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*NAUSHAD AHMAD “ZEB” RAZVI*
*ALLAHABAD*
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By Zebnews

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