Fri. Jul 23rd, 2021

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*हिन्दी/hinglish*    *गैरुल्लाह से मदद मांगना*
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*ⓩ बेशक ग़ैरुल्लाह से मदद मांगना जायज़ है और अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे दूर से सुनते हैं देखते हैं और मदद भी करते हैं,नीचे मैं क़ुर्आनो हदीस व खुद वहाबियों की किताबों से 23 हवाले दे रहा हूं मुलाहज़ा करें*

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*दूर से सुनना*
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*.1. कंज़ुल ईमान* – एक चींटी बोली ऐ चींटियों अपने बिलों में चली जाओ तुम्हे कुचल ना डाले सुलेमान और उसका लश्कर बेखबरी में तो उसकी बात सुनकर सुलेमान मुस्कुरा कर हंसा

📕 पारा 19,सूरह नमल,आयत 18

*तफसीर* – हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम एक अज़ीम लश्कर लेकर जो कि 300 मील लम्बाई व चौड़ाई पर मुश्तमिल था,जिसमे जिन्नों इन्सो चरिंदो परिन्द सब शामिल थे,जब ये लश्कर मुल्के शाम के जंगलों से गुज़रा तो एक चींटी जो कि मादा थी और लंगड़ी थी,उसका नाम ताखिया जर्मी या मनज़रा था,ये खुद मलिका थी इसके लश्कर में करोड़ों चींटियां थीं,ये उन सबको मुखातब करके बोली कि अपने अपने घरों में चली जाओ कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान का लश्कर तुम्हें कुचल दे और उन्हें खबर तक न हो,जब उस चींटी ने ये बात कही उस वक़्त हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम उस चींटी से 3 मील दूर थे,1 मील = 1.60934 किलोमीटर तो 3 मील = 4.82802 किलोमीटर,यानि तक़रीबन आपने 5 किलोमीटर दूर से चींटी की आवाज़ सुनी और चींटी की इसी दानाई पर आप मुस्कुरा दिए,तो जब चींटी की न सुनाई देने वाली आवाज़ भी एक नबी सुन सकते हैं तो फिर हमारे आक़ा व मौला जो कि नबियों के सरदार हैं उनकी समाअत का क्या आलम होगा

📕 रूहुल बयान,पारा 19,सफह 745

*ⓩ उस चींटी की दानाई पर आप मुस्कुरा दिए अब ज़रा इसका मतलब भी समझ लीजिए कि एक छोटी और मामूली से चींटी ने हमको कितना बड़ा अक़ीदा सिखा दिया,ज़रा क़ुर्आन की उस आयत को दोबारा पढ़िए,पढ़िए और समझिए रब फरमाता है कि चींटी बोली,क्या बोली “कि कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान का लश्कर तुम्हे कुचल दे और उन्हें खबर तक न हो” अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर यानि उस चींटी को भी ये पता था कि अल्लाह के नबी मअसूम होते हैं और जानबूझकर हरगिज़ ऐसा नहीं कर सकते कि हमारे ऊपर से गुज़र जायें यानि हमें मार डालें,हां अनजाने में ऐसा हो सकता है इसीलिए वो सबको तम्बीह करते हुए बोली कि अपने बिलों में चली जाओ उसकी इसी दानाई को जब हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने सुना तो आप बिना मुस्कुराये नहीं रह सके,सुबहान अल्लाह,ये एक चींटी का अक़ीदा था और यही हम सुन्नियों का अक़ीदा है मगर वहीं इन वहाबियों का अक़ीदा देखिये जो मआज़ अल्लाह अम्बिया तो दूर की बात हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भी मअसूम नहीं जानते और उनको भी गुनाहगार समझते हैं मआज़ अल्लाहि रब्बिल आलमीन,और मैं कोई ढकी छिपी बात नहीं करता खुद इनके नाम निहाद हकीमुल उम्मत यानि अशरफ अली थानवी क़ुर्आन का तर्जुमा करते हुए लिखते हैं*

*थानवी तर्जुमा* – बेशक हमने आपको एक खुल्लम खुल्ला फतह दी.ताकि अल्लाह तआला आपकी सब अगली पिछली खतायें माफ फरमा दे (मआज़ अल्लाह)

*कंज़ुल ईमान* – बेशक हमने तुम्हारे लिए रौशन फतह दी.ताकि अल्लाह तुम्हारे सबब से गुनाह बख्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के

📕 पारा 26,सूरह फतह,आयत 1-2

*ⓩ दोनों तर्जुमों का स्क्रीन शॉट इमेज में मौजूद है,अल्लाह तआला फरमाता है कि ऐ महबूब हमने तुम्हारी वजह से तुमसे पहले वालों के और तुम्हारे बाद वालों के गुनाह माफ किये मगर इन जाहिलों ने अल्लाह के महबूब को ही गुनाहगार ठहरा दिया जबकि हक़ यही है कि अल्लाह के महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम अंबिया-ए किराम मअसूम और बे-ऐब पैदा किये गए मगर इन ज़ालिमों ने उन पाक मुक़द्दस हस्तियों तक को न छोड़ा,अब आप खुद फैसला कीजिये कि एक चींटी अम्बिया को मअसूम जान रही है जिसका खुद अल्लाह गवाह है और ये वहाबी उनको गुनहगार जानता है तो क्या इनकी अक़्ल उस चींटी से भी कम नहीं रह गयी,तो क्या ऐसी कम अक्ल वालों की कोई बात मानी और सुनी जानी चाहिए,नहीं और हरगिज़ नहीं,तो याद रखिये अब जब कोई भी वहाबी कभी भी किसी भी मसअले पर ऐतराज़ करे तो उसका वहीं रद्द कर दीजिये क्योंकि उसका कोई भी ऐतराज़ काबिले कुबूल नहीं,खैर आगे बढ़ते हैं*

*.2. कंज़ुल ईमान* – और लोगो में हज की निदा आम कर दे

📕 पारा 17,सूरह हज,आयत 27

*तफसीर* – जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम व हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने क़ाबा शरीफ तामीर कर दिया तो अल्लाह ने कहा कि एै नबी अब लोगों को इस घर के हज के लिए बुलाओ,तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि एै मौला किसको बुलाऊं यहां तो दूर दूर तक कोई नहीं,तब अल्लाह ने कहा तुम एलान करो सबको सुनाना मेरा काम है,तब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अबु कबीस पहाड़ पर चढ़कर लोगों से मुखातिब हुए,तो वो आवाज़ क़यामत तक जितने पैदा होने वाले थे सबने सुनी,हत्ता कि जो बाप की पुश्त में थे और जो मां के शिकम में थे या जो आलमे अरवाह में थे सबने वो आवाज़ सुनी और वहीं से लब्बैक कहा,तो जिसने उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहा है उसी को हज नसीब होगा और जिसने सुकूत इख़्तियार किया उसे हरगिज़ वहां की हाज़िरी नसीब न होगी.

📕 खज़ाईनुल इरफान,ज़ेरे आयत

*ⓩ सोचिये कि जब आम मुसलमानों की रूहें मां-बाप की पुश्त से और आलमे अरवाह से आवाज़ें सुन सकती हैं तो हुज़ूर व हुज़ूर के महबूबीन अपनी क़ब्रे अनवर से हमारी फरियाद क्यों नहीं सुन सकते*

*.3. कंज़ुल ईमान* – तो सालेह ने उनसे मुंह फेरा और कहा एै मेरी क़ौम बेशक मैंने तुम्हें अपने रब की रिसालत पहुंचा दी

📕 पारा 8,सूरह एराफ,आयात 79

*तफसीर* – हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम क़ौमे समूद की तरफ नबी बनाकर भेजे गए,क़ौमे समूद के कहने पर आपने अपना मोजज़ा दिखाया कि एक पहाड़ी से ऊंटनी ज़ाहिर हुई जिसने बाद में बच्चा भी जना,ये ऊंटनी तालाब का सारा पानी एक दिन खुद पीती और दूसरे दिन पूरी क़ौम,जब क़ौमे समूद को ये मुसीबत बर्दाश्त न हुई तो उन्होंने इस ऊंटनी को क़त्ल कर दिया,तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने उनके लिए अज़ाब की बद्दुआ की जो कि क़ुबूल हुई और वो पूरी बस्ती ज़लज़ले से तहस नहस हो गयी,जब सारी क़ौम मर गई तो आप उस मुर्दा क़ौम से मुखातिब होकर अर्ज़ करने लगे,जो कि ऊपर आयत में गुज़रा

📕 तफसीरे सावी,जिल्द 2,पेज 73-75

*.4. हदीस* – जंगे बद्र के दिन हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बद्र के मुर्दा कुफ्फारों का नाम लेकर उनसे खिताब किया,तो हज़रत उमर फारूक़े आज़म ने हैरत से अर्ज़ किया कि क्या हुज़ूर मुर्दा बेजान जिस्मों से मुखातिब हैं तो सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ‘एै उमर ख़ुदा की कसम ज़िंदा लोग इनसे ज़्यादा मेरी बात को नहीं समझ सकते’

📕 बुखारी शरीफ,जिल्द 1,सफह 183

*ⓩ सोचिये कि जब काफिरों के मुर्दो में अल्लाह ने सुनने की सलाहियत दे रखी है तो फिर अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे क्यों हमारी आवाज़ों को नहीं सुन सकते*

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*दूर से देखना*
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*.5. कंज़ुल ईमान* – और इसी तरह हम इब्राहीम को दिखाते हैं सारी बादशाही आसमानों की और ज़मीन की,इसलिए कि वो ऐनुल यक़ीन वालों में से हो जाये

📕 पारा 7,सूरह इन’आम,आयत 75

*तफसीर* – हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने पहाड़ पर खड़े खड़े सारे आसमान व ज़मीन को देखा,सबकी आवाजों को सुना,जन्नत दोज़ख को देखा,और तमाम मखलूक़ के आमालों को भी मुलाहज़ा फरमा लिया

📕 तफसीर रुहुल बयान,ज़ेरे आयत

*.6. हदीस* – हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अंधेरी रात में 10 फरसख के फासले से चींटी को देख लिया करते थे,1 फरसख = 3 मील तो 10 फरसख x 30 मील = यानि तक़रीबन 48 किलोमीटर दूर से आप चींटी को देख लिया करते थे

📕 तिबरानी बहवाला शिफा शरीफ,पेज 33

*.7. हदीस* – हज़रत उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने एक लश्कर निहावंद ईरान भेजा,जिसका सिपाह सालार सारिया नाम के शख्स को बनाया,एक दिन आपने जुमे का खुत्बा छोड़कर 3 मर्तबा ‘या सारियल जबल’ फरमाया,बाद नमाज़ के अब्दुर रहमान बिन औफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने माजरा पूछा तो आपने फरमाया कि मैंने मुसलमानों को देखा कि वो लड़ रहे हैं अचानक काफिर एक तरफ से आगे बढ़े तो मुझसे रहा न गया और मैंने सारिया को पहाड़ का सहारा लेने को कहा,चन्द रोज़ के बाद एक क़ासिद जंग का हाल लेकर वापस आया तो उसने बताया कि किसी आवाज़ देने वाले ने हमको पहाड़ की तरफ जाने को कहा तो हमने ऐसा ही किया और अल्लाह ने दुश्मनों को शिकस्त दी

📕 मिश्कात शरीफ,सफह 546

*ⓩ हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम 5 किलोमीटर दूर से चींटी की आवाज़ सुनें,हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम 48 किलोमीटर दूर से चींटी को देख लिया करें और हज़रत उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु सैकड़ों मील दूर से न तो सिर्फ देख ही रहे थे बल्कि मुश्किल में देखकर मदद भी फरमा रहे हैं हालांकि आप कोई नबी भी नहीं हैं कि कोई कह दे कि ये आपका मोजज़ा था,नहीं बल्कि ये खुली हुई करामत है कि अल्लाह वाले एक जगह रहते हुए भी पूरी दुनिया का मुशाहदा करते हैं*

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*गैरुल्लाह से मदद मांगना*
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*.8. कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो सब्र और नमाज़ से मदद चाहो

📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 153

*ⓩ ज़ाहिर सी बात है कि सब्र और नमाज़ खुदा नहीं,फिर फरमाता है*

*.9. कंज़ुल ईमान* – और नेकी और परहेज़गारी पर एक दूसरे की मदद करो

📕 पारा 6,सूरह माइदह,आयत 2

*ⓩ यहां एक दूसरे की मदद को कहा जा रहा है,और फरमाता है*

*.10. कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो दीने खुदा के मददगार हो

📕 पारा 28,सूरह सफ,आयत 14

*ⓩ यहां खुद मौला तआला मुसलमानों से अपने दीन की मदद करने को कह रहा है,और फरमाता है*

*.11. कंज़ुल ईमान* – बोले कौन मेरे मददगार होते हैं अल्लाह की तरफ तो हवारियों ने कहा हम दीने खुदा के मददगार हैं

📕 पारा 3,सूरह आले इमरान,आयत 52

*ⓩ यहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम से मदद मांगी,अगर ये शिर्क होता तो एक नबी हरगिज़ ऐसा न करते*

*.12. कंज़ुल ईमान* – तो मेरी मदद ताक़त से करो मैं तुममें और उनमें एक मज़बूत आड़ बना दूं

📕 पारा 16,सुरह कहफ,आयत 95

*तफसीर* – हज़रत सिकंदर ज़ुलक़रनैन ने आबे हयात की चाह में शिमाल की सिम्त सफर किया,वहां हज़रत खिज़्र ने तो आबे हयात पी लिया लेकिन आपके मुक़द्दर में न था,रास्ते में जब आप दो पहाड़ों के दरमियान में पहुंचे,तो वहां के लोगों ने याजूज माजूज की शिकायत की,तो आपने उन लोगों से कहा कि ताक़त से मेरी मदद करो,इस तरह आपने उन लोगो की मदद से सिद्दे सिकंदरी तामीर करवाई,जो क़यामत के करीब ही टूटेगी

📕 तफसीरे सावी,जिल्द 3,सफह 22

*ⓩ हज़रत सिकन्दर ज़ुलक़रनैन व आबे हयात और याजूज माजूज के बारे में तफसील से जानने के लिए आसारे क़यामत की 7वीं और 8वीं पोस्ट पढ़ें*

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*क्या गैरुल्लाह मदद भी करते हैं*
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*.13. कंज़ुल ईमान* – ऐ ग़ैब की खबर देने वाले अल्लाह तुम्हें काफी है और ये जितने मुसलमान तुम्हारे पैरु हैं (ये भी तुम्हें काफी हैं)

📕 पारा 10,सूरह इंफाल,आयात 64

*ⓩ यानि मुसलमान मदद करता है*

*.14. कंज़ुल ईमान* – तो बेशक अल्लाह उनका मददगार है और जिब्रील और नेक ईमान वाले और उसके बाद फरिश्ते मदद को हैं

📕 पारा 28,सूरह तहरीम,आयत 4

*ⓩ यहां मौला तआला मुसलमानो को फरिश्तों को जिब्रीले अमीन को मददगार बता रहा है,और फरमाता है*

*.15. कंज़ुल ईमान* – सुलेमान ने कहा ए दरबारियों तुममे कौन है जो उसका (बिल्क़ीस) का तख्त मेरे पास ले आए क़ब़्ल इसके कि वह मेरे हुज़ूर मुतीअ होकर हाज़िर हो

📕 पारा 19,सूरह नमल,आयत 38

*ⓩ हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने अपने दरबारियों से मदद तलब की अगर ये शिर्क होता तो नबी हरगिज़ कभी ऐसा न करते और उसपर कमाल ये कि कि आपकी ही उम्मत के वली हज़रत आसिफ बिन बर्खिया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आपकी मदद भी फरमाई,इसकी पूरी तफसीर मैंने करामात फोल्डर के अन्दर हज़रत आसिफ बिन बर्खिया के नाम से अपलोड की है वहीं से पढ़ा जाए,बेशक दूर से देखना सुनना और मदद करना ये खुदा की ही सिफत है,पर अल्लाह के ये मुक़द्दस बन्दे कैसे ये सब कर रहे हैं आईये रब से ही पूछते हैं*

*.16. हदीस* – हदीसे क़ुदसी है रब फरमाता है कि बन्दा नवाफिल के ज़रिये मेरा क़ुर्ब चाहता है पस मैं बन्दे को अपना क़ुर्ब अता करता हूं,जब मैं बन्दे को अपना दोस्त बना लेता हूं तो उसके कान हो जाता हूं जिससे वो सुनता है,उसकी आंख हो जाता हूं जिससे वो देखता है,उसके हाथ हो जाता हूं जिससे वो चीज़ों को पकड़ता है,और उसके पैर हो जाता हूं जिससे वो चलता है

📕 बुखारी शरीफ,जिल्द 2,पेज 963

*ⓩ इस हदीस को समझना हो तो ये आयतें मुलाहज़ा करें*

*.17. कंज़ुल ईमान* – ऐ महबूब वो खाक जो तुमने फेंकी तुमने न फेंकी बल्कि अल्लाह ने फेंकी

📕 पारा 9,सूरह इंफाल,आयात 17

*ⓩ हिजरत की रात हुज़ूर ने काफिरों पर 1 मुठ्ठी ख़ाक उठाकर फेंक दी और सबके सामने से आप चले गए और किसी ने ना देखा,उसी फेंकने को रब कह रहा है कि तुमने न फेंकी बल्कि मैंने फेंकी,अल्लाहु अकबर*

*.18. कंज़ुल ईमान* – वो जो तुम्हारी बैयत करते हैं वो तो अल्लाह ही से बैयत करते हैं उसके हाथों पर

📕 पारा 26,सूरह फतह,आयात 10

*ⓩ बैयते रिज़वान में जो सहाबाये किराम हुज़ूर के हाथ पर बैयत हुए,रब फरमा रहा है कि वो तो अल्लाह ही के हाथ पर बैयत हुए,बात खत्म हुई ये अल्लाह वाले अल्लाह की अता से ऐसा करते हैं,जो इंकार करता है वो क़ुर्आन का इंकार करता है,और जो क़ुर्आन की किसी 1 आयत का इंकार करदे वो काफिर है,पर चलते चलते ज़रा इन वहाबी मुनाफिक़ों की किताबों से भी कुछ हवाले देख लीजिये*

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*वहाबी और गैरुल्लाह*
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*ⓩ एक सवाल के जवाब पर मौलवी रशीद अहमद गंगोही लिखते हैं कि*

*.19. वहाबी – कुबूरे औलिया पर जाना और उनसे फैज़ हासिल करना इसमें कुछ हर्ज़ नहीं

📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,पेज 223

*ⓩ हर्ज़ नहीं,क्यों शिर्क नहीं है क्या*

*.20. वहाबी – मौलाना रफीउद्दीन के साथ हज़रत (थानवी) ने सरे हिन्द पहुंचकर शेख मुजद्दिद उल्फ सानी के मज़ार पर हाज़िरी दी

📕 हयाते अशरफ,सफह 25

*ⓩ फिर जब हम किसी वली के दरबार में हाज़िरी देते हैं तो तुम वहाबियों का कलेजा क्यों फटता है,और देखिये मौलवी अशरफ अली थानवी ने लिखा*

*.21. वहाबी –         दस्तगिरी कीजिये मेरे नबी
कशमकश में तुम ही हो मेरे वली

📕 नशरुत्तबीब फि ज़िक्रे नबीईल हबीब,सफह 164

*हम या रसूल अल्लाह कहें तो शिर्क*
*हम या ग़ौस अल मदद कहें तो शिर्क*
*हम या ख्वाजा मदद कहें तो शिर्क*
*और तुम नबी से मदद मांगो तो शिर्क नहीं*

*ⓩ मौलवी आरिफ सम्भली उस्ताज़ नदवतुल उलूम ने लिखा है कि*

*.22. वहाबी – पस बुज़ुर्गो की अरवाह से मदद लेने के हम मुंकिर नहीं

📕 बरैली फितने का नया रूप,सफह 139

*ⓩ तो क्या मआज़ अल्लाह सुन्नी इंकार करता है,और दो रुखी पालिसी पढ़ते जाईये,मौलवी हुसैन अहमद टांडवी लिखता है कि*

*.23. वहाबी – हमें जो कुछ मिला इसी सिलसिलाए चिश्तिया से मिला,जिसका खाये उसी का गाये

📕 शेखुल इस्लाम नम्बर,सफह 13

*ⓩ फिर जब हम कहते हैं कि ग़रीब नवाज़ से मिला है तो वहाबी शिर्क शिर्क क्यों भौंकने लगते हैं,जवाब दो,मगर दोगे कहां से क्योंकि वहाबियों के पास जवाब है ही नहीं,तुम्हारे पास तो सुन्नियों को गुमराह करने के लिए सिर्फ फर्ज़ी और मनघडंत बातें हैं जिनसे तुम भोले भाले मुसलमानों को बहकाते हो,मौला तआला हम सुन्नियों का ईमान सलामत रखे-आमीन*

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*END*
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*ⓩ Beshak gairullaah se madad maangana jaayaz hai aur allaah ke muqaddas bande door se sunate hain dekhate hain aur madad bhee karate hain,neeche main quraano hadees va khud vahaabiyon kee kitaabon se 23 havaale de raha hoon mulaahaza karen*

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*DOOR SE SUNNA*
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*.1. KANZUL IMAAN* – Ek cheentee bolee ai cheentiyon apane bilon mein chalee jao tumhe kuchal na daale sulemaan aur usaka lashkar bekhabaree mein to usakee baat sunakar sulemaan muskura kar hansa

📕 Paara 19,soorah namal,aayat 18

*TAFSEER* – Hazarat sulemaan alaihissalaam ek azeem lashkar lekar jo ki 300 meel lambaee va chaudaee par mushtamil tha,jisame jinnon inso charindo parind sab shaamil the,jab ye lashkar mulke shaam ke jangalon se guzara to ek cheentee jo ki maada thee aur langadee thee,usaka naam taakhiya jarmee ya manazara tha,ye khud malika thee isake lashkar mein karodon cheentiyaan theen,ye un sabako mukhaatab karake bolee ki apane apane gharon mein chalee jao kaheen aisa na ho ki sulemaan ka lashkar tumhen kuchal de aur unhen khabar tak na ho,jab us cheentee ne ye baat kahee us vaqt hazarat sulemaan alaihissalaam us cheentee se 3 meel door the,1 meel = 1.60934 kilomeetar to 3 meel = 4.82802 kilomeetar,yaani taqareeban aapane 5 kilomeetar door se cheentee kee aavaaz sunee aur cheentee kee isee daanaee par aap muskura die,to jab cheentee kee na sunaee dene vaalee aavaaz bhee ek nabee sun sakate hain to phir hamaare aaqa va maula jo ki nabiyon ke saradaar hain unakee samaat ka kya aalam hoga

📕 Roohul bayaan,paara 19,saphah 745

*ⓩ Us cheentee kee daanaee par aap muskura die ab zara isaka matalab bhee samajh leejie ki ek chhotee aur maamoolee se cheentee ne hamako kitana bada aqeeda sikha diya,zara quraan kee us aayat ko dobaara padhie,padhie aur samajhie rab pharamaata hai ki cheentee bolee,kya bolee “ki kaheen aisa na ho ki sulemaan ka lashkar tumhe kuchal de aur unhen khabar tak na ho” allaahu akabar allaahu akabar yaani us cheentee ko bhee ye pata tha ki allaah ke nabee maasoom hote hain aur jaanaboojhakar haragiz aisa nahin kar sakate ki hamaare oopar se guzar jaayen yaani hamen maar daalen,haan anajaane mein aisa ho sakata hai iseelie vo sabako tambeeh karate hue bolee ki apane bilon mein chalee jao usakee isee daanaee ko jab hazarat sulemaan alaihissalaam ne suna to aap bina muskuraaye nahin rah sake,subahaan allaah,ye ek cheentee ka aqeeda tha aur yahee ham sunniyon ka aqeeda hai magar vaheen in vahaabiyon ka aqeeda dekhiye jo maaaz allaah ambiya to door kee baat huzoor sallallaahu taaala alaihi vasallam ko bhee maasoom nahin jaanate aur unako bhee gunaahagaar samajhate hain maaaz allaahi rabbil aalameen,aur main koee dhakee chhipee baat nahin karata khud inake naam nihaad hakeemul ummat yaani asharaph alee thaanavee quraan ka tarjuma karate hue likhate hain*

*THANVI TARJUMA* – Beshak hamane aapako ek khullam khulla phatah dee.taaki allaah taaala aapakee sab agalee pichhalee khataayen maaph pharama de (maaaz allaah)

*KANZUL IMAAN* – Beshak hamane tumhaare lie raushan phatah dee.taaki allaah tumhaare sabab se gunaah bakhshe tumhaare agalon ke aur tumhaare pichhalon ke

📕 Paara 26,soorah phatah,aayat 1-2

*ⓩ Dono tarjumon ka skreen shot imej mein maujood hai,allaah taaala pharamaata hai ki ai mahaboob hamane tumhaaree vajah se tumase pahale vaalon ke aur tumhaare baad vaalon ke gunaah maaph kiye magar in jaahilon ne allaah ke mahaboob ko hee gunaahagaar thahara diya jabaki haq yahee hai ki allaah ke mahaboob sallallaahu taaala alaihi vasallam aur tamaam ambiya-e kiraam maasoom aur be-aib paida kiye gae magar in zaalimon ne un paak muqaddas hastiyon tak ko na chhoda,ab aap khud phaisala keejiye ki ek cheentee ambiya ko maasoom jaan rahee hai jisaka khud allaah gavaah hai aur ye vahaabee unako gunahagaar jaanata hai to kya inakee aql us cheentee se bhee kam nahin rah gayee,to kya aisee kam akl vaalon kee koee baat maanee aur sunee jaanee chaahie,nahin aur haragiz nahin,to yaad rakhiye ab jab koee bhee vahaabee kabhee bhee kisee bhee masale par aitaraaz kare to usaka vaheen radd kar deejiye kyonki usaka koee bhee aitaraaz kaabile kubool nahin,khair aage badhate hain*

*.2. KANZUL IMAAN* – Aur logo mein haj kee nida aam kar de

📕 Paara 17,soorah haj,aayat 27

*TAFSEER* – Jab hazarat ibraaheem alaihissalaam va hazarat ismaeel alaihissalaam ne qaaba shareeph taameer kar diya to allaah ne kaha ki eai nabee ab logon ko is ghar ke haj ke lie bulao,to hazarat ibraaheem alaihissalaam ne kaha ki eai maula kisako bulaoon yahaan to door door tak koee nahin,tab allaah ne kaha tum elaan karo sabako sunaana mera kaam hai,tab hazarat ibraaheem alaihissalaam abu kabees pahaad par chadhakar logon se mukhaatib hue,to vo aavaaz qayaamat tak jitane paida hone vaale the sabane sunee,hatta ki jo baap kee pusht mein the aur jo maan ke shikam mein the ya jo aalame aravaah mein the sabane vo aavaaz sunee aur vaheen se labbaik kaha,to jisane unakee aavaaz par labbaik kaha hai usee ko haj naseeb hoga aur jisane sukoot ikhtiyaar kiya use haragiz vahaan kee haaziree naseeb na hogee.

📕 Khazaeenul iraphaan,zere aayat

*ⓩ Sochiye ki jab aam musalamaanon kee roohen maan-baap kee pusht se aur aalame aravaah se aavaazen sun sakatee hain to huzoor va huzoor ke mahaboobeen apanee qabre anavar se hamaaree phariyaad kyon nahin sun sakate*

*.3. KANZUL IMAAN* – To saaleh ne unase munh phera aur kaha eai meree qaum beshak mainne tumhen apane rab kee risaalat pahuncha dee

📕 Paara 8,soorah eraaph,aayaat 79

*TAFSEER* – Hazarat saaleh alaihissalaam qaume samood kee taraph nabee banaakar bheje gae,qaume samood ke kahane par aapane apana mojaza dikhaaya ki ek pahaadee se oontanee zaahir huee jisane baad mein bachcha bhee jana,ye oontanee taalaab ka saara paanee ek din khud peetee aur doosare din pooree qaum,jab qaume samood ko ye museebat bardaasht na huee to unhonne is oontanee ko qatl kar diya,to hazarat saaleh alaihissalaam ne unake lie azaab kee baddua kee jo ki qubool huee aur vo pooree bastee zalazale se tahas nahas ho gayee,jab saaree qaum mar gaee to aap us murda qaum se mukhaatib hokar arz karane lage,jo ki oopar aayat mein guzara

📕 Taphaseere saavee,jild 2,page 73-75

*.4. HADEES* – Junge badr ke din huzoor sallallaahu taaala alaihi vasallam ne badr ke murda kuphphaaron ka naam lekar unase khitaab kiya,to hazarat umar phaarooqe aazam ne hairat se arz kiya ki kya huzoor murda bejaan jismon se mukhaatib hain to sarakaar sallallaahu taaala alaihi vasallam ne pharamaaya ki eai umar khuda kee kasam zinda log inase zyaada meree baat ko nahin samajh sakate

📕 Bukhaaree shareeph,jild 1,saphah 183

*ⓩ Sochiye ki jab kaaphiron ke murdo mein allaah ne sunane kee salaahiyat de rakhee hai to phir allaah ke muqaddas bande kyon hamaaree aavaazon ko nahin sun sakate*

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*DOOR SE DEKHNA*
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*.5. KANZUL IMAAN* – Aur isee tarah ham ibraaheem ko dikhaate hain saaree baadashaahee aasamaanon kee aur zameen kee,isalie ki vo ainul yaqeen vaalon mein se ho jaaye

📕 Paara 7,soorah inaam,aayat 75

*TAFSEER* – Hazarat ibraaheem alaihissalaam ne pahaad par khade khade saare aasamaan va zameen ko dekha,sabakee aavaajon ko suna,jannat dozakh ko dekha,aur tamaam makhalooq ke aamaalon ko bhee mulaahaza pharama liya

📕 Taphaseer ruhul bayaan,zere aayat

*.6. HADEES* – Hazarat abu huraira raziyallaahu taaala anhu se maravee hai ki rasool allaah sallallaahu alaihi vasallam ne pharamaaya ki hazarat moosa alaihissalaam andheree raat mein 10 pharasakh ke phaasale se cheentee ko dekh liya karate the,1 pharasakh = 3 meel to 10 pharasakh x 30 meel = yaani taqareeban 48 kilomeetar door se aap cheentee ko dekh liya karate the

📕 Tibaraanee bahavaala shipha shareeph,pej 33

*.7. HADEES* – Hazarat umar phaarooqe aazam raziyallaahu taaala anhu ne ek lashkar nihaavand eeraan bheja,jisaka sipaah saalaar saariya naam ke shakhs ko banaaya,ek din aapane jume ka khutba chhodakar 3 martaba ya saariyal jabal pharamaaya,baad namaaz ke abdur rahamaan bin auf raziyallaahu taaala anhu ne maajara poochha to aapane pharamaaya ki mainne musalamaanon ko dekha ki vo lad rahe hain achaanak kaaphir ek taraph se aage badhe to mujhase raha na gaya aur mainne saariya ko pahaad ka sahaara lene ko kaha,chand roz ke baad ek qaasid jang ka haal lekar vaapas aaya to usane bataaya ki kisee aavaaz dene vaale ne hamako pahaad kee taraph jaane ko kaha to hamane aisa hee kiya aur allaah ne dushmanon ko shikast dee

📕 Mishkaat shareeph,saphah 546

*ⓩ Hazarat sulemaan alaihissalaam 5 kilomeetar door se cheentee kee aavaaz sunen,hazarat moosa alaihissalaam 48 kilomeetar door se cheentee ko dekh liya karen aur hazarat umar phaarooqe aazam raziyallaahu taaala anhu saikadon meel door se na to sirph dekh hee rahe the balki mushkil mein dekhakar madad bhee pharama rahe hain haalaanki aap koee nabee bhee nahin hain ki koee kah de ki ye aapaka mojaza tha,nahin balki ye khulee huee karaamat hai ki allaah vaale ek jagah rahate hue bhee pooree duniya ka mushaahada karate hain*

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*GAIRULLAH SE MADAD MAANGNA*
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*.8. KANZUL IMAAN* – Ai eemaan vaalo sabr aur namaaz se madad chaaho

📕 Paara 2,soorah baqar,aayat 153

*ⓩ Zaahir see baat hai ki sabr aur namaaz khuda nahin,phir pharamaata hai*

*.9. KANZUL IMAAN* – Aur nekee aur parahezagaaree par ek doosare kee madad karo

📕 Paara 6,soorah maidah,aayat 2

*ⓩ Yahaan ek doosare kee madad ko kaha ja raha hai,aur pharamaata hai*

*.10. KANZUL IMAAN* – Ai eemaan vaalo deene khuda ke madadagaar ho

📕 Paara 28,soorah saph,aayat 14

*ⓩ Yahaan khud maula taaala musalamaanon se apane deen kee madad karane ko kah raha hai,aur pharamaata hai*

*.11. KANZUL IMAAN* – Bole kaun mere madadagaar hote hain allaah kee taraph to havaariyon ne kaha ham deene khuda ke madadagaar hain

📕 Paara 3,soorah aale imaraan,aayat 52

*ⓩ Yahaan hazarat eesa alaihissalaam ne apanee kaum se madad maangee,agar ye shirk hota to ek nabee haragiz aisa na karate*

*.12. KANZUL IMAAN* – To meree madad taaqat se karo main tumamen aur unamen ek mazaboot aad bana doon

📕 Paara 16,surah kahaph,aayat 95

*TAFSEER* – Hazarat sikandar zulaqaranain ne aabe hayaat kee chaah mein shimaal kee simt saphar kiya,vahaan hazarat khizr ne to aabe hayaat pee liya lekin aapake muqaddar mein na tha,raaste mein jab aap do pahaadon ke daramiyaan mein pahunche,to vahaan ke logon ne yaajooj maajooj kee shikaayat kee,to aapane un logon se kaha ki taaqat se meree madad karo,is tarah aapane un logo kee madad se sidde sikandaree taameer karavaee,jo qayaamat ke kareeb hee tootegee

📕 Taphaseere saavee,jild 3,saphah 22

*ⓩ Hazarat sikandar zulaqaranain va aabe hayaat aur yaajooj maajooj ke baare mein taphaseel se jaanane ke lie aasaare qayaamat kee 7veen aur 8veen post padhen ya neeche die hue link ko opan karen*

*http://zebnews.in/?p=597*
*http://zebnews.in/?p=599*

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*GAIRULLAH KA MADAD KARNA*
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*.13. KANZUL IMAAN* – Ai gaib kee khabar dene vaale allaah tumhen kaaphee hai aur ye jitane musalamaan tumhaare pairu hain (ye bhee tumhen kaaphee hain)

📕 Paara 10,soorah imphaal,aayaat 64

*ⓩ Yaani musalamaan madad karata hai*

*.14. KANZUL IMAAN* – To beshak allaah unaka madadagaar hai aur jibreel aur nek eemaan vaale aur usake baad pharishte madad ko hain

📕 Paara 28,soorah tahareem,aayat 4

*ⓩ Yahaan maula taaala musalamaano ko pharishton ko jibreele ameen ko madadagaar bata raha hai,aur pharamaata hai*

*.15. KANZUL IMAAN* – Sulemaan ne kaha e darabaariyon tumame kaun hai jo usaka (bilqees) ka takht mere paas le aae qabla isake ki vah mere huzoor mutee hokar haazir ho

📕 Paara 19,soorah namal,aayat 38

*ⓩ Hazarat sulemaan alaihissalaam ne apane darabaariyon se madad talab kee agar ye shirk hota to nabee haragiz kabhee aisa na karate aur usapar kamaal ye ki ki aapakee hee ummat ke valee hazarat aasiph bin barkhiya raziyallaahu taaala anhu ne aapakee madad bhee pharamaee,isakee pooree taphaseer mainne karaamaat pholdar ke andar hazarat aasiph bin barkhiya ke naam se apalod kee hai vaheen se padha jae ya neeche die hue link ko opan karen*

*http://zebnews.in/?p=1123*

*ⓩ Beshak door se dekhana sunana aur madad karana ye khuda kee hee siphat hai,par allaah ke ye muqaddas bande kaise ye sab kar rahe hain aaeeye rab se hee poochhate hain*

*.16. HADEES* – Hadeese qudasee hai rab pharamaata hai ki banda navaaphil ke zariye mera qurb chaahata hai pas main bande ko apana qurb ata karata hoon,jab main bande ko apana dost bana leta hoon to usake kaan ho jaata hoon jisase vo sunata hai,usakee aankh ho jaata hoon jisase vo dekhata hai,usake haath ho jaata hoon jisase vo cheezon ko pakadata hai,aur usake pair ho jaata hoon jisase vo chalata hai

📕 Bukhaaree shareeph,jild 2,pej 963

*ⓩ Is hadees ko samajhana ho to ye aayaten mulaahaza karen*

*.17. KANZUL IMAAN* – Ai mahaboob vo khaak jo tumane phenkee tumane na phenkee balki allaah ne phenkee

📕 Paara 9,soorah imphaal,aayaat 17

*ⓩ Hijarat kee raat huzoor ne kaaphiron par 1 muththee khaak uthaakar phenk dee aur sabake saamane se aap chale gae aur kisee ne na dekha,usee phenkane ko rab kah raha hai ki tumane na phenkee balki mainne phenkee,allaahu akabar*

*.18. KANZUL IMAAN* – Vo jo tumhaaree baiyat karate hain vo to allaah hee se baiyat karate hain usake haathon par

📕 Paara 26,soorah phatah,aayaat 10

*ⓩ Baiyate rizavaan mein jo sahaabaaye kiraam huzoor ke haath par baiyat hue,rab pharama raha hai ki vo to allaah hee ke haath par baiyat hue,baat khatm huee ye allaah vaale allaah kee ata se aisa karate hain,jo inkaar karata hai vo quraan ka inkaar karata hai,aur jo quraan kee kisee 1 aayat ka inkaar karade vo kaaphir hai,par chalate chalate zara in vahaabee munaaphiqon kee kitaabon se bhee kuchh havaale dekh leejiye*

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*WAHABI AUR GAIRULLAH*
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*ⓩ Ek savaal ke javaab par maulavee rasheed ahamad gangohee likhate hain ki*

*.19. WAHABI – Kuboore auliya par jaana aur unase phaiz haasil karanaa ismen kuchh harz nahin

📕 Fataava rasheediya,jild 1,pej 223

*ⓩ Harz nahin,kyon shirk nahin hai kya*

*.20. WAHABI – Maulaana rapheeuddeen ke saath hazarat (thaanavee) ne sare hind pahunchakar shekh mujaddid ulph saanee ke mazaar par haaziree dee

📕 Hayaate asharaph,saphah 25

*ⓩ Phir jab ham kisee valee ke darabaar mein haaziree dete hain to tum vahaabiyon ka kaleja kyon phatata hai,aur dekhiye maulavee asharaph alee thaanavee ne likha*

*.21. WAHABI – Dastagiree keejiye mere nabee
Kashamakash mein tum hee ho mere valee

📕 Nasharuttabib fi zikre nabiyil habeeb,saphah 164

*Hum ya rasool allaah kahen to shirk*
*Hum ya gaus al madad kahen to shirk*
*Hum ya khvaaja madad kahen to shirk*
*Aur tum nabee se madad maango to shirk nahin*

*ⓩ Maulavee aariph sambhalee ustaaz nadavatul uloom ne likha hai ki*

*.22. WAHABI – Pas buzurgo kee aravaah se madad lene ke ham munkir nahin

📕 Barailee phitane ka naya roop,saphah 139

*ⓩ To kya maaaz allaah sunnee inkaar karata hai,aur do rukhee paalisee padhate jaeeye,maulavee husain ahamad taandavee likhata hai ki*

*.23. WAHABI – Hamen jo kuchh mila isee silasilae chishtiya se mila,jisaka khaaye usee ka gaaye

📕 Shekhul islaam nambar,saphah 13

*ⓩ Phir jab ham kahate hain ki gareeb navaaz se mila hai to vahaabee shirk shirk kyon bhaunkane lagate hain,javaab do,magar doge kahaan se kyonki vahaabiyon ke paas javaab hai hee nahin,tumhaare paas to sunniyon ko gumaraah karane ke lie sirph pharzee aur managhadant baaten hain jinase tum bhole bhaale musalamaanon ko bahakaate ho,maula taaala ham sunniyon ka eemaan salaamat rakhe-aameen*

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*Don’t Call Only WhatsApp 9559893468*
*NAUSHAD AHMAD “ZEB” RAZVI*
*ALLAHABAD*
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By Zebnews

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